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| जब रक्षक ही नहीं सुरक्षित, तो जनता का क्या? गढ़ थाने का 'रोजनामचा' सोशल मीडिया पर वायरल, पुलिस की गोपनीयता पर सवाल Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश के पूर्वांचल का यह क्षेत्र इन दिनों कानून-व्यवस्था की चरमराती स्थिति को लेकर चर्चा में है। स्थिति यह है कि आम जनता तो दूर, अब जनप्रतिनिधि और खुद पुलिसकर्मी भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मऊगंज और मनगवां के विधायकों द्वारा लगातार की जा रही शिकायतों के बावजूद प्रशासनिक उदासीनता किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार करती प्रतीत होती है। ताजा मामला गढ़ थाने से जुड़ा है, जहाँ पुलिस की आंतरिक गोपनीयता की धज्जियां उड़ाते हुए 'रोजनामचा' (Daily Diary) के पन्ने सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए गए हैं।
रोजनामचा हुआ सार्वजनिक: एक परिवार की छवि दांव पर
पुलिस विभाग में रोजनामचा एक अत्यंत गोपनीय दस्तावेज होता है, जिसे केवल न्यायालय या वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष ही प्रस्तुत किया जा सकता है। किंतु गढ़ थाने में पदस्थ एक सहायक उपनिरीक्षक (ASI) की व्यथा और उनके द्वारा लिखित रोजनामचे की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होना, पुलिस प्रशासन की बड़ी चूक है। इस वायरल रोजनामचे में एक युवती और उसके परिवार का उल्लेख होने से उनकी सामाजिक छवि धूमिल हो रही है। पीड़ित परिवार इस बदनामी और सामाजिक दबाव के कारण गहरे मानसिक संकट में है, जिसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
पुलिस अधिकारी खुद भयभीत या दबाव की राजनीति?
रोजनामचे के अनुसार, संबंधित पुलिसकर्मी क्षेत्र के कुछ खास व्यक्तियों और जातियों से स्वयं को भयभीत बता रहे हैं। यहाँ सवाल यह उठता है कि यदि एक वर्दीधारी अधिकारी इतना असुरक्षित है कि उसे रोजनामचे में अपनी सुरक्षा की गुहार लगानी पड़ रही है, तो उस क्षेत्र की जनता का क्या होगा? जनचर्चा और जानकारों का मानना है कि इस रोजनामचे को वायरल करने के पीछे 'समझौते का खेल' या 'झूठी रिपोर्ट' दर्ज कराने का दबाव हो सकता है। यदि रोजनामचे में दर्ज बातें इतनी गंभीर थीं, तो अभी तक एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं की गई? और यदि मामला दर्ज नहीं हुआ, तो यह गोपनीय दस्तावेज बाहर कैसे आया?
संविधान बनाम स्वच्छंदता
लोकतंत्र में संविधान हर नागरिक को स्वतंत्र रहने का अधिकार देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता किसी दूसरे की मर्यादा का हनन करने की इजाजत नहीं देती। पुलिस अधिकारियों की यह जिम्मेदारी है कि वे रोजनामचे की गोपनीयता बनाए रखें। गढ़ थाना क्षेत्र के टिकुरी से भी पहले संबंधित अधिकारियों की शिकायतें हो चुकी हैं, लेकिन ठोस कार्यवाही के अभाव में व्यवस्था बेलगाम होती दिख रही है।
जांच का विषय: कौन है जिम्मेदार?
यह पूरा प्रकरण अब जांच के घेरे में है। क्या रोजनामचा इसलिए वायरल किया गया ताकि किसी पर दबाव बनाया जा सके? क्या पुलिस विभाग के अंदरूनी तंत्र में सेंध लग चुकी है? वरिष्ठ अधिकारियों को इस मामले में हस्तक्षेप कर यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी निर्दोष परिवार की मानहानि न हो और कानून की गरिमा बरकरार रहे।
