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| 'लापता' विधायक और खौफ में लोकतंत्र? मऊगंज के प्रदीप पटेल के 'अज्ञातवास' की इनसाइड स्टोरी Aajtak24 News |
मऊगंज - मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक अजीबोगरीब पहेली चर्चा का विषय बनी हुई है। एक तरफ सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 'सुशासन' और 'अपराधमुक्त प्रदेश' का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के एक विधायक पिछले 20 दिनों से अपनी विधानसभा से गायब हैं। हम बात कर रहे हैं मऊगंज के भाजपा विधायक प्रदीप पटेल की, जिनकी 'दबंग' छवि अब 'दहशत' में बदल चुकी है।
सत्ता अपनी, शासन अपना, फिर डर किसका?
हैरानी की बात यह है कि राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है, गृह मंत्रालय खुद मुख्यमंत्री के पास है, और जिले के आला अधिकारी विधायक की उंगलियों पर तैनात हैं। इसके बावजूद मऊगंज विधायक प्रदीप पटेल भोपाल में किसी 'गुमनाम' ठिकाने पर बैठे हैं। उनके घर और दफ्तर पर ताले लटके हैं और सुरक्षा के नाम पर केवल सीसीटीवी कैमरों का पहरा है। सवाल उठ रहा है कि जो विधायक कभी खुद जेसीबी लेकर अतिक्रमण ढहाने निकल पड़ता था, जो अपराधियों को पकड़ने के लिए रात-रात भर सड़कों पर पहरा देता था, आखिर उसे अचानक अपनी जान का इतना खतरा क्यों लगने लगा कि उसने अपने परिवार को भी 'डिजिटल कैद' (सामान ऑनलाइन मंगाने की सलाह) में रहने को कह दिया है?
'दबंग' से 'डरे हुए' विधायक तक का सफर
प्रदीप पटेल की पहचान हमेशा से एक आक्रामक नेता की रही है। 2018 में पहली बार विधायक बनने के बाद शिवराज सरकार में उन्हें पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग में जगह मिली। उस दौरान उनके तेवर अलग थे। लेकिन 2023 में सत्ता परिवर्तन (नेतृत्व परिवर्तन) के बाद स्थितियां बदल गईं।
जनवरी की वो घटना: इस पूरे विवाद की जड़ 3 जनवरी की घटना है। रीवा-बनारस नेशनल हाईवे की एक विवादित जमीन पर विधायक पहुंचे, वहां झड़प हुई और उन्हें मौके से भागना पड़ा।
बदले हुए सुर: शुरुआत में उन्होंने कहा कि वे कानून के साथ हैं, लेकिन भोपाल पहुंचते ही उनके सुर बदल गए। अब वे खुद को असुरक्षित बता रहे हैं और पुलिस प्रशासन पर माफियाओं से मिले होने का आरोप लगा रहे हैं।
जनता त्रस्त, विधायक 'अज्ञातवास' में मस्त?
मऊगंज जिले में दो विधानसभाएं हैं। एक तरफ देवतालाब विधायक गिरीश गौतम शान से क्षेत्र में घूम रहे हैं, जनता के बीच जा रहे हैं। दूसरी तरफ मऊगंज की जनता अनाथ महसूस कर रही है। विकास कार्य ठप हैं, जनता की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। क्षेत्र के लोग हैरान हैं कि जिस अनिल पांडे (लालू) पर विधायक ने जान से मारने की धमकी का आरोप लगाया, वह खुद वीडियो जारी कर आत्महत्या की चेतावनी दे रहा है। लालू का आरोप है कि विधायक के दबाव में प्रशासन उसे 'टारगेट' कर रहा है। ऐसे में असली सवाल यह है कि डर असल में किसे लग रहा है—विधायक को या उस आम आदमी को जिसे प्रशासन ने निशाने पर लिया है?
क्या यह 'दबाव की राजनीति' है?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह कोई डर नहीं, बल्कि 'प्रेशर पॉलिटिक्स' है। जानकारों का मानना है कि प्रदीप पटेल सरकार में अपनी उपेक्षा से नाराज हैं।
पद की लालसा: चर्चा है कि विधायक चाहते हैं कि उन्हें किसी निगम या मंडल का अध्यक्ष बनाया जाए।
अधिकारियों से तालमेल का अभाव: विधायक ने पहले भी तत्कालीन रीवा आईजी और एडिशनल एसपी पर माफियाओं के संरक्षण का आरोप लगाया था।
भविष्य की अनिश्चितता: उनके हालिया बयानों में यह झलक दिखती है जब वे कहते हैं कि "देखते हैं 3 साल बाद राजनीति करेंगे या नहीं।"
प्रशासन का पक्ष: "सब नियंत्रण में है"
मऊगंज एसपी दिलीप सोनी के मुताबिक जिले में कोई भय का माहौल नहीं है। पुलिस ने विवादित मामले में 150 लोगों पर केस दर्ज किया है, NSA और जिला बदर की कार्रवाई भी की गई है। पांच सदस्यीय SIT मामले की जांच कर रही है। लेकिन प्रशासन की ये दलीलें तब तक फीकी हैं, जब तक खुद क्षेत्र का विधायक अपने घर लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा।
लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं
मध्य प्रदेश में यह पहली बार देखा जा रहा है कि एक सत्ताधारी विधायक अपनी ही पुलिस और अपनी ही सरकार के साए में असुरक्षित महसूस कर रहा है। यदि एक विधायक इतना डरा हुआ है, तो मऊगंज की आम जनता का क्या हाल होगा? या फिर, यदि यह केवल एक राजनीतिक दांव-पेंच है, तो जनता के विकास की बलि चढ़ाना कहाँ तक जायज है? फिलहाल, मऊगंज की जनता अपने 'लापता' विधायक की राह देख रही है, और भोपाल के गलियारों में प्रदीप पटेल की यह 'गुमनामी' सरकार की साख पर सवालिया निशान खड़ा कर रही है।
