रीवा-मऊगंज: 'बबूल बोकर आम की तलाश' में भाजपा सरकार, विकास का दावा सिर्फ फाइलों और भवनों तक सीमित Aajtak24 News

रीवा-मऊगंज: 'बबूल बोकर आम की तलाश' में भाजपा सरकार, विकास का दावा सिर्फ फाइलों और भवनों तक सीमित Aajtak24 News

रीवा - मध्य प्रदेश की सत्तासीन भाजपा सरकार में विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि "बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय।" रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में सत्ता का डंडा और झंडा भले ही भाजपा का हो, लेकिन उसे थामने वाले हाथ वही पुराने कांग्रेसी, बसपा और कम्युनिस्ट विचारधारा के हैं। दल-बदल की इस राजनीति ने भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं और आम जनता को ठगा हुआ महसूस करने पर मजबूर कर दिया है।

दिखावे का विकास: भवन खड़े हैं, सेवाएं नदारद

क्षेत्र में विकास के नाम पर केवल कंक्रीट के ढांचे (भवन) और सड़कें नजर आ रही हैं। सरकारी रिकॉर्ड में स्कूल और अस्पताल के भव्य भवन दर्ज हैं, लेकिन जब धरातल पर उनकी उपयोगिता देखी जाती है, तो स्थिति शून्य है। स्कूलों में न पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही पढ़ने वाले बच्चे। अस्पतालों की स्थिति और भी बदतर है, जहाँ डॉक्टर न होने के कारण ग्रामीण जनता निजी अस्पतालों की शरण लेने को मजबूर है। शिक्षा और स्वास्थ्य के निजीकरण के चलते आम आदमी की पूरी कमाई इन्हीं दो बुनियादी जरूरतों में स्वाहा हो रही है।

पर्यावरण की बलि: नष्ट हो रहे प्राकृतिक स्रोत

विकास की अंधी दौड़ में रीवा और मऊगंज की प्राकृतिक संपदा को बेरहमी से लूटा जा रहा है। अवैध खदानों का कारोबार फल-फूल रहा है। नदियों के प्राकृतिक बहाव को मोड़कर या नष्ट कर प्राकृतिक जल स्रोतों का गला घोंटा जा रहा है। सबसे दुखद पहलू वृक्षारोपण का है। राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के दौरान हजारों दीर्घकालिक वृक्ष (महुआ, पीपल, आम) काट दिए गए। रिकॉर्ड में तो वृक्षारोपण के बड़े-बड़े दावे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि रीवा से हनुमना और चाकघाट तक सड़कों के किनारे एक भी नया पौधा नहीं पनपा है। इसके विपरीत, पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की सीमा (प्रयागराज) शुरू होते ही दो-तीन वर्ष पुराने लहलहाते वृक्ष दिखाई देने लगते हैं, जो मध्य प्रदेश प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

सत्ता की लालसा और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा

जनता ने कांग्रेस शासन से त्रस्त होकर भाजपा को जनादेश दिया था, लेकिन भाजपा ने सत्ता की लालसा में कांग्रेसियों का ही विलय कर उन्हें कमान सौंप दी। नतीजा यह है कि शासन की संस्कृति पुरानी ही बनी हुई है। भाजपा का पुराना निष्ठावान कार्यकर्ता आज खुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है। 'पार्टी विथ डिफरेंस' का दावा करने वाली भाजपा अब विचारधारा के बजाय केवल सत्ता के केंद्र के रूप में पहचानी जा रही है। अवैध उत्खनन, वन विनाश और बुनियादी सुविधाओं का अभाव यह दर्शाते हैं कि विकास केवल रिकॉर्ड तक सीमित है। यदि जल्द ही जमीनी सुधार नहीं हुए, तो केवल भवनों के निर्माण से जनता का विश्वास जीतना सरकार के लिए नामुमकिन होगा।

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