सहकारिता में 'लोकतंत्र' पर 'राजतंत्र' हावी: चुनाव में देरी से चरमराई पैक्स समितियों की व्यवस्था Aajtak24 News

सहकारिता में 'लोकतंत्र' पर 'राजतंत्र' हावी: चुनाव में देरी से चरमराई पैक्स समितियों की व्यवस्था Aajtak24 News

रीवा - मध्य प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ मानी जाने वाली प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियां (PACS) आज एक अजीबोगरीब संवैधानिक और प्रशासनिक संकट से गुजर रही हैं। सहकारिता का मूल सिद्धांत 'सब एक के लिए और एक सबके लिए' है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर आधारित होता है। लेकिन वर्तमान में यहाँ लोकतंत्र केवल किताबों तक सीमित रह गया है और व्यावहारिक रूप से 'राजतंत्र' जैसी स्थिति निर्मित हो गई है। वर्षों से लंबित चुनावों ने इन संस्थाओं को अराजकता की आग में झोंक दिया है।

प्रशासकों का एकाधिकार और अधिकारों का हनन नियमतः किसी भी सहकारी समिति में प्रशासक की नियुक्ति एक अल्पकालिक व्यवस्था होती है, जिसका एकमात्र उद्देश्य निर्वाचन संपन्न होने तक व्यवस्था को सुचारू रखना होता है। लेकिन प्रदेश में पिछले कई वर्षों से प्रशासक ही सर्वेसर्वा बने हुए हैं। निर्वाचित बोर्ड की अनुपस्थिति में ये प्रशासक अब वे नीतिगत निर्णय ले रहे हैं, जिनका अधिकार केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होता है। सूत्रों की मानें तो कई समितियों में नियम विरुद्ध तरीके से वेतन वृद्धि की गई है और मनमाने वित्तीय लाभ लिए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।

प्रबंधन की विफलता और आर्थिक क्षति समितियों के प्रबंधन में अब अनुभवी कैडर के बजाय 'प्रभारी' समिति सेवकों का वर्चस्व है। इन प्रभारियों को बड़े और महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिए गए हैं, जिनके पास न तो पर्याप्त प्रशिक्षण है और न ही दूरगामी जवाबदेही। इसका सबसे घातक परिणाम ऋण वसूली पर पड़ा है। निर्वाचित प्रबंधन के अभाव में सोसायटियों के कानूनी प्रकरण ठंडे बस्ते में हैं और अरबों रुपयों की ऋण वसूली अटकी पड़ी है। जानकारों का कहना है कि यदि जल्द ही निर्वाचित बोर्ड नहीं बना, तो सोसायटियों को होने वाले नुकसान का बोझ सीधे किसानों और सरकारी खजाने पर पड़ेगा।

संवैधानिक विरोधाभास और जन-आक्रोश आम जनता और विशेषकर किसान वर्ग इस बात से बेहद आक्रोशित है कि जब देश में पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव समय पर हो सकते हैं, तो सहकारिता, मंडी बोर्ड और जल उपभोक्ता संधों को क्यों दरकिनार किया जा रहा है? मंडी बोर्ड और समितियों में निर्वाचित प्रतिनिधियों के न होने से किसानों की समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है। किसान अब सवाल पूछने लगे हैं कि क्या सहकारिता विभाग में लोकतंत्र को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है?

 सहकारिता आंदोलन का पतन ग्रामीण भारत की आत्मनिर्भरता पर सीधा प्रहार है। प्रशासकों और प्रभारियों के भरोसे चल रही सोसायटियां अब केवल राजनीतिक और व्यक्तिगत लाभ का जरिया बनकर रह गई हैं। यदि सरकार समय रहते इन संस्थाओं में चुनाव नहीं कराती है, तो आने वाले समय में पैक्स सोसायटियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। रीवा सहित पूरे प्रदेश में अब इस 'राजतंत्र' के खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं, जो आने वाले समय में एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकती हैं।

Post a Comment

Previous Post Next Post