रीवा-मऊगंज में सफेद हाथी बने सरकारी अस्पताल, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी जनता की सांसें Aajtak24 News

रीवा-मऊगंज में सफेद हाथी बने सरकारी अस्पताल, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी जनता की सांसें Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज -
 मध्य प्रदेश के रीवा और नवनिर्मित मऊगंज जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल ऐसा है कि यहाँ बीमार होना किसी सजा से कम नहीं है। सरकार भले ही विकास के बड़े-बड़े विज्ञापनों से अखबारों के पन्ने भर दे, लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि करोड़ों की लागत से बने सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आज 'अस्पताल' नहीं बल्कि 'भूतिया बंगले' और 'पशुओं के तबेले' नजर आते हैं।

खंडहर होते आयुर्वेद औषधालय और लापता डॉक्टर

जिले के आयुर्वेद औषधालयों की हालत सबसे अधिक दयनीय है। यहाँ डॉक्टरों की नियुक्तियाँ केवल सरकारी रजिस्टरों तक सीमित हैं। अधिकांश डॉक्टर मुख्यालय से नदारद रहकर शहरों में ऐश-ओ-आराम की जिंदगी काट रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि महीनों तक इन औषधालयों के ताले नहीं खुलते। जब जिम्मेदार अधिकारियों से इस बारे में पूछा जाता है, तो वे बेशर्मी से तर्क देते हैं कि "कम से कम प्राथमिक उपचार तो मिल रहा है।" सवाल यह है कि जब ताले ही नहीं खुलते, तो क्या हवा से उपचार हो रहा है?

रसूखदारों की सेवा में 'सरकारी नौकर'

स्वास्थ्य विभाग की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि यहाँ वार्ड बॉय, नर्स और अन्य कर्मचारी जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि रसूखदारों की जी-हुजूरी के लिए रखे गए हैं। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, कई स्वास्थ्य कर्मी स्थानीय नेताओं, रसूखदार पत्रकारों और अधिकारियों के घरों में घरेलू काम, बच्चों को पढ़ाने या निजी ड्राइवरी करने में व्यस्त हैं। ये कर्मचारी महीने में एक बार आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और बिना काम किए सरकारी खजाने से वेतन का बड़ा हिस्सा डकार रहे हैं। यह भ्रष्टाचार और रसूख के गठजोड़ का सबसे नग्न प्रदर्शन है।

निशुल्क दवा योजना: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा बजट

प्रधानमंत्री निशुल्क दवा योजना का ढिंढोरा पीटने वाला स्वास्थ्य विभाग ग्रामीणों को एक 'डिस्पिरिन' तक उपलब्ध कराने में नाकाम है। बजट में दवाओं के नाम पर अरबों रुपये खर्च दिखाए जाते हैं, लेकिन हकीकत में सरकारी अस्पतालों की अलमारियाँ खाली हैं। मरीजों को मजबूरन निजी मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएँ खरीदनी पड़ती हैं, जहाँ से अस्पताल के ही कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों का कमीशन बंधा होता है। गरीब ग्रामीण, जिनके पास दो वक्त की रोटी के पैसे नहीं हैं, वे इन मेडिकल स्टोरों के कर्ज तले दबते जा रहे हैं।

झोलाछाप डॉक्टरों का आतंक और प्रशासन की चुप्पी

जब सरकारी सिस्टम दम तोड़ देता है, तो मौत के सौदागर सक्रिय हो जाते हैं। रीवा और मऊगंज के गाँव-गाँव में अवैध रूप से चल रहे झोलाछाप डॉक्टरों के क्लीनिक इसका प्रमाण हैं। डिग्री के नाम पर इनके पास कुछ नहीं है, लेकिन ये लोगों की नसों में 'जानलेवा इंजेक्शन' ठोंक रहे हैं। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की इस पर चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या इन झोलाछाप डॉक्टरों से मिलने वाला 'मासिक चढ़ावा' ऊपर तक पहुँच रहा है?

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता बजट

अरबों का स्वास्थ्य बजट आखिर जा कहाँ रहा है? भवनों की पुताई और कागजी आँकड़ों में खुशहाली दिखाने वाले अधिकारियों को शायद ग्रामीणों की चीखें सुनाई नहीं देतीं। रीवा और मऊगंज की जनता आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। यदि जल्द ही इन 'शोपीस' अस्पतालों में सुधार नहीं हुआ, तो यह जर्जर तंत्र किसी दिन बड़ी जनहानि का कारण बनेगा।

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