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| वर्दी की गरिमा पर रील का साया: इंदौर में डिमोशन, तो रीवा में चुप्पी क्यों? Aajtak24 News |
रीवा - सोशल मीडिया पर लाइक और फॉलोअर्स की भूख जब खाकी की गरिमा को निगलने लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है। लेकिन जब एक ही अपराध के लिए दो अलग-अलग जिलों में न्याय के तराजू अलग तरीके से झुकने लगें, तो व्यवस्था पर सवालिया निशान और गहरा हो जाता है। ताजा मामला मध्य प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर रहा है—जहाँ एक तरफ इंदौर में 'रीलबहादुर' पुलिसकर्मी पर गाज गिरी, वहीं रीवा में महिला अधिकारी को लेकर सिस्टम ने मौन साध लिया है।
इंदौर: रील का शौक और पद की गिरावट
इंदौर में तैनात प्रधान आरक्षक रंजीत सिंह के लिए सोशल मीडिया का मोह भारी पड़ गया। रंजीत पर आरोप था कि उन्होंने सरकारी गाड़ी, हथियार और हथकड़ी का उपयोग कर रौब झाड़ते हुए वीडियो बनाए। जेल के बाहर वर्दी में वीडियो बनाना अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा माना गया। जैसे ही वीडियो वायरल हुए और विभाग सक्रिय हुआ, रंजीत ने साक्ष्य मिटाने के लिए रील डिलीट कर दीं, लेकिन पुलिस विभाग ने इसे गंभीरता से लिया। परिणाम स्वरूप, उन्हें प्रधान आरक्षक से आरक्षक पद पर डिमोशन (पदोन्नति की जगह पदावनति) की सजा सुनाई गई।
रीवा: 'मैडम' की रील पर क्यों नहीं हुई हलचल?
ठीक ऐसा ही दृश्य रीवा में देखने को मिला। यहाँ की यातायात प्रभारी अनिमा शर्मा पर भी वर्दी में वीडियो बनाने और सरकारी संसाधनों का रील के लिए उपयोग करने के गंभीर आरोप लगे। सोशल मीडिया पर उनकी रील चर्चा का विषय बनीं। जैसे ही इंदौर वाली कार्रवाई की आहट रीवा पहुँची, आनन-फानन में मैडम के सोशल मीडिया हैंडल से रील गायब हो गईं। सवाल यह है कि क्या रील डिलीट कर देना अपराध को खत्म कर देता है? इंदौर में रंजीत सिंह के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया, लेकिन रीवा में यातायात प्रभारी के खिलाफ अब तक कोई विभागीय कदम नहीं उठाया गया है।
एक जैसा अपराध, अलग-अलग सज़ा: क्या जेंडर देख कर होता है इंसाफ?
जनता के बीच अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या पुलिस महकमे में अनुशासन के नियम लिंग (Gender) देखकर लागू होते हैं?
इंदौर का पुरुष आरक्षक: तत्काल कार्रवाई और पद की कटौती।
रीवा की महिला अधिकारी: साक्ष्यों के बाद भी अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी।
जब इस विषय पर रीवा एसपी से स्पष्टीकरण मांगा गया, तो उन्होंने किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया। न कोई जांच समिति, न कोई नोटिस—सिर्फ खामोशी। यह खामोशी अब जनता के गुस्से को हवा दे रही है। क्या रसूख और पद के आगे नियम बौने पड़ जाते हैं?
सिस्टम की साख पर सवाल
वर्दी अनुशासन का प्रतीक है, मनोरंजन का साधन नहीं। अगर अनुशासनहीनता इंदौर में अपराध है, तो वह रीवा में भी उतनी ही बड़ी चूक है। एसपी और उच्च अधिकारियों की यह चुप्पी विभाग के भीतर ही असंतोष पैदा कर रही है। विभाग के निचले स्तर के कर्मचारी भी यह देख रहे हैं कि क्या नियम सिर्फ उनके लिए हैं, या साहबों के चहेतों को 'रील' बनाने की खुली छूट है? जनता और महकमा अब जवाब चाहता है। क्या रीवा पुलिस अपनी निष्पक्षता साबित करेगी, या फिर यह मामला फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा? जवाब देना अब सिस्टम की मजबूरी बन चुका है।
