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| शिक्षा या कुटीर उद्योग? रीवा-मऊगंज के स्कूलों में लैब असिस्टेंट गायब, भविष्य से खिलवाड़ Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - देश को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प और 'पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया' जैसे नारे रीवा और मऊगंज जिले की सीमा में प्रवेश करते ही दम तोड़ देते हैं। यहाँ शिक्षा व्यवस्था अब सेवा का माध्यम न रहकर एक 'कुटीर उद्योग' की तरह संचालित हो रही है, जहाँ सरकारी तंत्र की नाकामी का सीधा फायदा निजी स्कूल माफिया उठा रहे हैं।
प्रयोगशालाएं बनीं 'कबाड़खाना'
कक्षा 9वीं से 12वीं तक के उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की स्थिति सबसे ज्यादा डरावनी है। विज्ञान के छात्र बिना किसी प्रयोग के वैज्ञानिक बनने का सपना देख रहे हैं। विडंबना देखिए कि वर्तमान में 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं, लेकिन साल भर छात्रों ने प्रयोगशाला (Lab) के भीतर कदम तक नहीं रखा। इसका कारण यह है कि वर्षों से लैब असिस्टेंट (प्रयोगशाला सहायक) के पद रिक्त पड़े हैं। बिना किसी प्रैक्टिकल ज्ञान के बच्चों को दिए जाने वाले अंक केवल कागजी खानापूर्ति हैं, जो उनके भविष्य की नींव को खोखला कर रहे हैं।
स्टाफ का टोटा: चपरासी तक नहीं
ग्रामीण अंचलों के स्कूलों में स्थिति यह है कि कई जगह ताला खोलने और पानी पिलाने के लिए चपरासी तक मौजूद नहीं है। स्टाफ की भारी कमी के कारण स्कूलों में पढ़ाई का माहौल पूरी तरह खत्म हो चुका है। प्राथमिक और माध्यमिक शालाएं तो बंद होने की कगार पर पहुँच गई हैं। प्रशासन की यह अनदेखी साफ दर्शाती है कि ग्रामीण बच्चों की शिक्षा उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे है।
25 वर्षों का सूखा और ठगा हुआ आमजन
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पिछले ढाई दशकों से सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, लेकिन उनके बच्चों की तकदीर नहीं बदली। सरकारी स्कूलों की इस जर्जर हालत ने गरीब अभिभावकों को मजबूर कर दिया है कि वे अपनी खून-पसीने की कमाई निजी स्कूलों के भारी-भरकम 'कुटीर उद्योग' में झोंक दें। 25 सालों से लैब असिस्टेंट की भर्ती का इंतजार कर रहे छात्र अब युवा होकर बेरोजगार घूम रहे हैं, और नई पीढ़ी भी उसी रास्ते पर धकेली जा रही है।
सवालिया निशान पर 'आत्मनिर्भर भारत'
जब बुनियादी शिक्षा ही बिना लैब और बिना स्टाफ के वेंटिलेटर पर है, तो तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास के दावे कैसे सच होंगे? रीवा और मऊगंज के इन स्कूलों से निकलने वाले छात्र कॉलेज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में खुद को कहाँ पाएंगे? प्रशासन की चुप्पी और सरकार की उदासीनता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गरीबों के बच्चों के लिए शिक्षा अब केवल एक औपचारिक बोझ बनकर रह गई है।
