राजस्व न्यायालयों में 'अंधेरगर्दी': न पेजिंग, न इंडेक्स, सिर्फ 'तारीख पर तारीख'! अधिवक्ता संघ ने भ्रष्टाचार और भू-घोटालों की खोली पोल Aajtak24 News

राजस्व न्यायालयों में 'अंधेरगर्दी': न पेजिंग, न इंडेक्स, सिर्फ 'तारीख पर तारीख'! अधिवक्ता संघ ने भ्रष्टाचार और भू-घोटालों की खोली पोल Aajtak24 News

रीवा - विंध्य क्षेत्र की राजस्व व्यवस्था इन दिनों सवालों के घेरे में है। रीवा अधिवक्ता संघ, मनगवां के सचिव बृजेंद्र प्रताप सिंह ने रीवा और मऊगंज जिले की तहसीलों की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए इसे पूरी तरह 'पटरी से उतरी हुई' व्यवस्था करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि तहसीलों में नियम-कायदों को ताक पर रखकर केवल 'सेवा शुल्क' का खेल चल रहा है, जिससे आम आदमी न्याय की आस छोड़ चुका है।

फाइलों का 'मायाजाल' और गायब होते रिकॉर्ड

सचिव बृजेंद्र प्रताप सिंह ने प्रशासनिक अव्यवस्था की परतें खोलते हुए बताया कि तहसील न्यायालयों में बुनियादी नियमों का पालन तक नहीं हो रहा है। न्यायालयीन फाइलों में न तो सूची (इंडेक्स) लगाई जा रही है और न ही पन्नों की पेजिंग की जा रही है। सबसे गंभीर स्थिति पेशी रजिस्टर की है; रजिस्टर व्यवस्थित न होने के कारण वकीलों और पक्षकारों को यह तक पता नहीं चल पाता कि उनका केस किस नंबर पर और कब सुना जाएगा। उन्होंने सीधे तौर पर जिला कलेक्टर से मांग की है कि इन न्यायालयों का औचक निरीक्षण किया जाए ताकि रिकॉर्ड रूम की असलियत सामने आ सके।

सरकारी जमीनों पर 'दबंगों' का कब्जा, फाइलों पर धूल

अधिवक्ता संघ ने एक सनसनीखेज आरोप लगाया है कि जहाँ निजी मामलों में रसूखदारों की सुनवाई तेजी से होती है, वहीं शासकीय संपत्तियों के संरक्षण से जुड़े मामले ठंडे बस्ते में पड़े हैं।

  • शासकीय रिकॉर्ड सुधार के लिए 40-42 पेशियां होने के बावजूद कोई निर्णय नहीं लिया जा रहा है।

  • स्थिति यह है कि कई सरकारी भवनों, कार्यालयों और सार्वजनिक सड़कों का विवरण आज भी डिजिटल खसरे या नक्शे में दर्ज नहीं है।

  • उदाहरण के तौर पर बालक स्कूल की भूमि संख्या 146, 151 और 77 जैसे दर्जनों भू-खंड वर्षों से फाइलों में दबे पड़े हैं, जबकि मौके पर भू-माफिया सक्रिय हैं।

रकबे में 'जादुई' बढ़ोतरी: क्या यह बड़ा घोटाला है?

अधिवक्ता सिंह ने नक्शे और खसरे में हेराफेरी का एक बड़ा उदाहरण देते हुए भ्रष्टाचार की ओर इशारा किया। उन्होंने बताया कि पटवारी हल्का गढ़ की भूमि नंबर 51, जो पुराने नक्शे में 1 एकड़ 25 डिसमिल दर्ज थी, उसे अब कंप्यूटर रिकॉर्ड में बढ़ाकर 1 एकड़ 40-42 डिसमिल कर दिया गया है। बिना किसी वैध आधार के रकबा बढ़ जाना किसी बड़े भू-घोटाले का संकेत है, जो आने वाले समय में खूनी संघर्ष और कानूनी विवादों का कारण बनेगा।

वारिसान के नाम पर 'वसूली' का खुला खेल

राजस्व न्यायालयों की सुस्ती का सबसे बड़ा खामियाजा उन ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है जो अपने पूर्वजों की जमीन का नामांतरण (वारिसान) कराना चाहते हैं। आरोप है कि 15-15 सालों से ये मामले लंबित रखे जाते हैं ताकि दलालों के जरिए 15 से 20 हजार रुपये तक की 'अवैध वसूली' की जा सके। शासन के 'राजस्व महाअभियान' पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि ये अभियान केवल कागजी आंकड़ों को भरने के लिए हैं, जबकि हकीकत में गांवों की सड़कें और सरकारी जमीनें सरकारी नक्शे से ही गायब हो चुकी हैं।

अधिवक्ता संघ की चेतावनी: "नहीं सुधरे हालात तो बंद हों ये दफ्तर"

प्रशासनिक ढुलमुल रवैये से नाराज अधिवक्ता संघ ने जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त से 'विशेष जांच अभियान' की मांग की है। उन्होंने सवाल किया कि आखिर किस कानून के तहत प्रकरणों को 5-6 वर्षों तक लंबित रखा जा रहा है? सिंह ने कड़े लहजे में कहा कि यदि ये न्यायालय केवल भ्रष्टाचार और अवैध वसूली का अड्डा बने रहेंगे, तो इन्हें जनता के हित में बंद कर देना ही बेहतर होगा।



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