![]() |
| रीवा-मऊगंज के 'अवैध' चेक पोस्टों पर वसूली का खेल: नेताओं और अफसरों के 'सेवा शुल्क' से जनता पस्त Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में कानून की धज्जियां उड़ाने वाला एक ऐसा सिंडिकेट सक्रिय है, जो सरकारी आदेशों को पैरों तले कुचल रहा है। रीवा और मऊगंज जिले, जो उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे हैं, इन दिनों राष्ट्रीय राजमार्ग 30 और 35 पर चल रहे 'वसूली के खेल' के कारण सुर्खियों में हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन चेक पोस्टों को सरकार कागजों में बंद घोषित कर चुकी है, वे धरातल पर आज भी 'अघोषित' रूप से फल-फूल रहे हैं।
अघोषित बैरियर: जहाँ सरकारी आदेश नहीं, 'रसूख' चलता है
मिर्जापुर और प्रयागराज को जोड़ने वाले इन प्रमुख मार्गों पर गुजरने वाले हर ट्रक और लोडिंग वाहन के लिए एक 'अलिखित' कानून काम करता है। स्थानीय लोगों और चालकों का आरोप है कि यहाँ अवैध चेक पोस्ट बनाकर वाहनों से 'सेवा शुल्क' के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है। ताज्जुब की बात यह है कि ये बैरियर पुलिस थानों और प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे हैं, लेकिन कोई भी अधिकारी इस ओर मुड़कर देखने को तैयार नहीं है।
सत्ता, विपक्ष और खाकी की 'त्रिवेणी'
चर्चा है कि इस अवैध वसूली का हिस्सा केवल एक विभाग तक सीमित नहीं है। सूत्रों के अनुसार, इस 'काली कमाई' की मलाई में स्थानीय थानों के अधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अफसर, सत्ता पक्ष के दबंग नेता और विपक्ष के रसूखदार चेहरे भी बराबर के साझेदार हैं। यहाँ तक कि कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता भी इस सिंडिकेट के लिए 'कवच' का काम कर रहे हैं। यह एक ऐसा गठजोड़ है जिसने परिवहन विभाग को अपनी जागीर बना लिया है।
चालकों की 'आह' और प्रशासनिक चुप्पी
देशभर से आने वाले वाहन चालक जब इन मार्गों से गुजरते हैं, तो उन्हें सुरक्षा के बजाय प्रताड़ना मिलती है। चालकों का कहना है कि पूर्व में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कड़े रुख के बाद उम्मीद जगी थी कि आरटीओ घोटाले और चेक पोस्टों की 'ठेकेदारी' प्रथा बंद होगी, लेकिन गढ़-मऊगंज की सीमाओं पर आज भी वही पुराना ढर्रा जारी है। यह चुप्पी सवाल खड़ा करती है कि क्या लोकायुक्त, सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों की नजर परिवहन विभाग के अधिकारियों और उनके करीबियों की बेनामी संपत्तियों पर नहीं पड़ती?
बीजेपी की छवि पर गहराता 'दाग'
वर्तमान सत्ता संगठन के लिए यह स्थिति किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। आम जनता के बीच यह चर्चा आम है कि स्वार्थी नेता और अवसरवादी अधिकारी तो सत्ता बदलते ही पाला बदल लेंगे, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की शुचिता वाली छवि पर यह 'अवैध वसूली' एक स्थायी कलंक बनती जा रही है। वाहन चालकों और स्थानीय नागरिकों का बढ़ता आक्रोश आने वाले समय में एक बड़ा राजनीतिक संकट पैदा कर सकता है।
कब होगी 'सर्जिकल स्ट्राइक'?
रीवा और मऊगंज की जनता अब खोखले दावों से ऊब चुकी है। सवाल यह है कि प्रशासन के 'ईमानदार' कहे जाने वाले आला अफसर कब इन बैरियरों पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' करेंगे? क्या सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी ही सरकार की साख बचाने के लिए इन बिचौलियों और वसूली एजेंटों पर नकेल कसेंगे?
रीवा-मऊगंज के ये अवैध चेक पोस्ट न केवल भ्रष्टाचार का केंद्र हैं, बल्कि यह राज्य सरकार की कार्यप्रणाली को भी खुली चुनौती दे रहे हैं। यदि समय रहते इन अघोषित बैरियरों को जड़ से खत्म नहीं किया गया, तो 'सुशासन' का नारा केवल दीवारों पर लिखा रह जाएगा और जनता का विश्वास पूरी तरह से उठ जाएगा।
