व्यवस्था की चौखट पर दम तोड़ती उम्मीदें; 5 महीने से पेंशन बंद, दफ्तरों के चक्कर काट रही बेबस बुजुर्ग महिला Aajtak24 News

व्यवस्था की चौखट पर दम तोड़ती उम्मीदें; 5 महीने से पेंशन बंद, दफ्तरों के चक्कर काट रही बेबस बुजुर्ग महिला Aajtak24 News

रीवा - मध्य प्रदेश सरकार एक ओर जहाँ बुजुर्गों को 'श्रवण कुमार' बनकर सहारा देने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं रीवा जिले से आई एक तस्वीर इन दावों की पोल खोल रही है। जिले की डागरडुआ पंचायत के कोल्हा गांव में एक बुजुर्ग महिला पिछले पांच महीनों से अपनी वृद्धावस्था पेंशन के लिए सरकारी दफ्तरों और बैंकों की खाक छान रही हैं। उम्र के जिस पड़ाव में उन्हें आराम और सम्मान मिलना चाहिए था, उस उम्र में वे सिस्टम की लापरवाही के कारण पाई-पाई को मोहताज हैं।

केवाईसी के बाद भी नहीं सुलझा तकनीकी पेंच

पीड़िता के अनुसार, पिछले चार-पांच महीनों से उनकी पेंशन अचानक बंद कर दी गई। जब उन्होंने बैंक में संपर्क किया, तो उन्हें KYC (नो योर कस्टमर) की प्रक्रिया पूरी करने की सलाह दी गई। बुजुर्ग महिला ने तुरंत सीएससी (CSC) केंद्र जाकर अपनी केवाईसी अपडेट करवा ली, लेकिन इसके बावजूद उनके खाते में पेंशन की राशि नहीं आई। हैरानी की बात यह है कि जब भी वह बैंक या संबंधित सरकारी कार्यालय जाती हैं, तो उन्हें 'ऑनलाइन सर्वर' या 'तकनीकी त्रुटि' का बहाना बनाकर टाल दिया जाता है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में एक बुजुर्ग महिला का लैपटॉप और फाइलों के बीच उलझकर रह जाना प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण है।

दाने-दाने को मोहताज, इलाज का संकट

पेंशन बंद होने का असर बुजुर्ग महिला की पूरी दिनचर्या पर पड़ा है। उन्होंने रूंधे गले से बताया कि:

  • दवाइयों का संकट: आर्थिक तंगी के कारण समय पर दवाइयां नहीं मिल पा रही हैं।

  • भोजन की समस्या: वृद्धावस्था में उचित पोषण की आवश्यकता होती है, लेकिन पेंशन न मिलने से उन्हें भोजन के लिए भी दूसरों की मदद लेनी पड़ रही है।

  • मानसिक प्रताड़ना: उम्र के इस पड़ाव पर बार-बार दफ्तरों के चक्कर काटना उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है।

अकेला मामला नहीं, कई बुजुर्ग हैं परेशान

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कोल्हा गांव और डागरडुआ पंचायत में यह कोई इकलौता मामला नहीं है। कई अन्य बुजुर्गों की पेंशन भी इसी तरह तकनीकी कारणों या प्रशासनिक ढिलाई की भेंट चढ़ चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत स्तर के अधिकारी समस्याओं को सुनने के बजाय उन्हें टालने में अधिक विश्वास रखते हैं।

जिम्मेदारों की चुप्पी और उठते सवाल

यह मामला उजागर करता है कि कैसे सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुँचने से पहले ही फाइलों में दब जाता है।

  1. आखिर केवाईसी (KYC) अपडेट होने के बाद भी पेंशन क्यों बहाल नहीं हुई?

  2. क्या पंचायत और जनपद स्तर के अधिकारियों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे ऐसे बुजुर्गों के घर जाकर समस्याओं का निराकरण करें?

  3. सरकारी दावों और धरातल की हकीकत में इतना बड़ा अंतर क्यों है?

प्रशासन से न्याय की गुहार

पीड़िता और गांव के जागरूक नागरिकों ने रीवा कलेक्टर और जिला प्रशासन से मांग की है कि इस मामले की तत्काल जांच की जाए। उन्होंने मांग की है कि:

  • बुजुर्ग महिला की रुकी हुई 5 महीने की पेंशन राशि एकमुश्त दी जाए।

  • पेंशन रोके जाने के कारणों की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई हो।

  • पंचायत स्तर पर विशेष शिविर लगाकर पेंशन संबंधी समस्याओं का स्थायी समाधान किया जाए।

यदि समय रहते इन बुजुर्गों की सुध नहीं ली गई, तो सरकारी योजनाएं केवल कागजी विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएंगी। जिला प्रशासन को चाहिए कि वे इस बेबस मां की पुकार सुनें और उन्हें उनका हक दिलाएं।



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