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| सिस्टम की बेरुखी... 3 साल, दर्जनों तारीखें, पर दिव्यांग विधवा को अब तक नहीं मिला अपना आशियाना Aajtak24 News |
रीवा - सुशासन और त्वरित न्याय के सरकारी दावे रीवा जिले की मनगवां तहसील में दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। यहाँ एक बेसहारा दिव्यांग विधवा महिला बीते तीन वर्षों से अपने ही हक की जमीन के लिए तहसील कार्यालय के चक्कर काट रही है, लेकिन उसे न्याय के नाम पर केवल 'तारीख पर तारीख' मिल रही है।
वैध पट्टा, फिर भी दर-दर की ठोकरें
मामला मनगवां तहसील के नायब तहसीलदार वृत्त गढ़ का है। ग्राम पंचायत लौरी कला की निवासी उषा सिंह (पति स्व. नागेंद्र सिंह) शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं और पति के निधन के बाद अपने पुत्र पुष्पेंद्र सिंह के साथ जीवन यापन कर रही हैं। उषा सिंह के पास उनके नाम पर दर्ज भूमि का वैध पट्टा और स्वामित्व के तमाम दस्तावेज मौजूद हैं। इसके बावजूद, वह अपनी ही जमीन पर मकान निर्माण नहीं करा पा रही हैं।
विपक्षी का रसूख और 'स्टे' का खेल
पीड़िता का आरोप है कि प्रभावशाली विपक्षी पक्ष द्वारा बार-बार न्यायालय से स्थगन आदेश (Stay Order) प्राप्त कर लिया जाता है। जैसे ही निर्माण की उम्मीद जगती है, विपक्षी पक्ष कानूनी पेचीदगियों का सहारा लेकर काम रुकवा देता है। पिछले तीन सालों से चल रहे इस 'स्टे' के खेल ने एक दिव्यांग महिला को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़कर रख दिया है।
पीड़िता की व्यथा: "मेरे पास जमीन के कागज हैं, सरकार ने मुझे पट्टा दिया है, फिर भी मैं बेघर हूँ। हर बार तहसील आती हूँ तो नई तारीख दे दी जाती है। क्या एक विधवा और दिव्यांग होना ही मेरी सबसे बड़ी सजा है?"
प्रशासनिक मौन पर उठते गंभीर सवाल
हैरानी की बात यह है कि जब इस संवेदनशील मामले में राजस्व अधिकारियों का पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। प्रशासनिक स्तर पर बरती जा रही यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है:
यदि महिला के पास वैध पट्टा है, तो विपक्षी को बार-बार स्थगन आदेश कैसे मिल रहा है?
क्या राजस्व न्यायालय में चल रही प्रक्रिया केवल प्रभावशाली लोगों के हितों की रक्षा कर रही है?
एक दिव्यांग महिला के लिए विधिक सहायता और त्वरित सुनवाई की व्यवस्था कहाँ है?
न्याय की अंतिम उम्मीद
आर्थिक तंगी और शारीरिक लाचारी के बीच उषा सिंह का संघर्ष अब समाज और जिले के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए एक परीक्षा बन गया है। समाचार के माध्यम से जिला प्रशासन, वरिष्ठ राजस्व अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से अपील की गई है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें। एक दिव्यांग बेवा को न्याय दिलाना केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का विषय है। अब देखना यह है कि क्या रीवा प्रशासन इस 'तारीख पर तारीख' के सिलसिले को खत्म कर उषा सिंह को उनके अपने घर की छत नसीब करा पाता है या नहीं।
