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| सियासत की बंदूक और 130 एकड़ का 'खूनी' खेल: मऊगंज में पूर्व लोकसभा प्रत्याशी पर जमीन हड़पने का संगीन आरोप Aajtak24 News |
मऊगंज - मध्य प्रदेश का 53वां जिला मऊगंज, इन दिनों विकास की खबरों के लिए नहीं, बल्कि 'सफेदपोश डकैती' के लिए चर्चा में है। मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर दूर, सीधी को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित पचपहरा पहाड़ आज जंग का मैदान बन चुका है। यहाँ 130 एकड़ की वो बेशकीमती जमीन है, जिस पर कभी पकरा और पतियारी गांव के 35 पट्टेदार किसान अपनी आजीविका उगाते थे, लेकिन आज वहां बंदूकधारियों की गाड़ियाँ धूल उड़ाती फिर रही हैं।
चुनावी सुशासन का नकाब उतरा 2024 के रीवा लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले अभिषेक पटेल ने रैलियों में किसानों के हित और सर्व समाज के कल्याण की कसमें खाई थीं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही 'नेताजी' का चोला उतर गया और सामने आया एक ऐसा चेहरा जो 20-25 गाड़ियों के काफिले और असलहों के साथ गरीब किसानों की पुश्तैनी जमीन पर कब्जा करने निकला है।
कैसे हुआ 130 एकड़ का 'महा-घोटाला'? यह मामला साल 2016-17 से शुरू हुआ। रामभुआल, नरेंद्र कुमार और शशिकांत पांडे जैसे 35 किसान, जिनके पूर्वज सदियों से यहाँ खेती कर रहे थे, उन्हें अचानक पता चला कि वे अपनी ही जमीन पर 'अतिक्रामक' घोषित कर दिए गए हैं।
मिलीभगत का खेल: तत्कालीन पटवारी हीरालाल कॉल और तहसील कार्यालय के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने बिना किसी रजिस्ट्री या सूचना के, फर्जी हस्ताक्षरों के सहारे पूरी 130 एकड़ जमीन दूसरे नामों पर चढ़ा दी।
बेनामी का खेल: साजिश इतनी गहरी थी कि निलेश पांडे जैसे व्यक्ति के नाम पर जमीन की गई, जिसने खुद हलफनामा दिया कि उसे पता ही नहीं कि यह जमीन उसके नाम कैसे आई।
नेताजी की 'एंट्री' और दहशतगर्दी जब मामला कोर्ट पहुँचा, तो भू-माफियाओं ने इसे रसूखदारों को बेचना शुरू कर दिया। यहाँ एंट्री हुई अभिषेक पटेल की। आरोप है कि उन्होंने और उनके पिता बुद्धसेन पटेल सहित पूरे परिवार (रमेश, गेंदालाल, अर्चना, सुरेश, विश्वनाथ पटेल) के नाम पर करीब 40 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री करा ली। अब इस विवादित जमीन पर प्लाटिंग करने के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के अन्य जिलों से बाउंसर और गाड़ियाँ बुलाई जा रही हैं। 70 साल के बुजुर्ग रामभुआल बताते हैं कि "रात भर हमें जागना पड़ता है, पता नहीं कब बंदूकधारी आ जाएँ और हमारी पुश्तैनी जमीन पर जेसीबी चला दें।"
प्रशासन की 'चूड़ियाँ' और गडरा कांड की याद मऊगंज पुलिस और प्रशासन की चुप्पी सबसे ज्यादा डरावनी है। रामभुआल ने अभिषेक पटेल के खिलाफ बंदूक दिखाकर धमकाने की लिखित शिकायत दी, लेकिन रसूख के आगे कानून बौना नजर आ रहा है। यह वही मऊगंज है जिसने गडरा कांड झेला है, जहाँ पुलिस की लापरवाही ने सनी द्विवेदी और ASI रामचरण गौतम जैसे लोगों की जान ले ली थी। पचपहरा पहाड़ पर भी आज वही बारूद सुलग रहा है। किसानों का आरोप है कि जिले के कुछ आला अधिकारी 'प्रॉपर्टी डीलर' की भूमिका में आ गए हैं और माफियाओं के हिस्सेदार बन चुके हैं।
न्याय की अंतिम उम्मीद अगर वक्त रहते मऊगंज कलेक्टर और एसपी ने इस भू-माफिया बनाम नेता बनाम अधिकारी के गठजोड़ को नहीं तोड़ा, तो पचपहरा की यह शांति किसी बड़े तूफान में बदल सकती है। क्या सरकार 35 परिवारों को उनके हक की जमीन वापस दिला पाएगी या फिर नेताजी की बंदूक के आगे लोकतंत्र एक बार फिर हार जाएगा?
