भ्रष्टाचार को 'ग्रीन सिग्नल': वेटरनरी विभाग का तुगलकी फरमान, गौशालाओं के करोड़ों के बजट पर अब कंपाउंडर की 'सील'! Aajtak24 News

भ्रष्टाचार को 'ग्रीन सिग्नल': वेटरनरी विभाग का तुगलकी फरमान, गौशालाओं के करोड़ों के बजट पर अब कंपाउंडर की 'सील'! Aajtak24 News

रीवा - जिले में गौवंश की दुर्दशा और गौशालाओं में जारी अव्यवस्थाओं के बीच पशुपालन विभाग के उपसंचालक (Deputy Director) का एक अजीबोगरीब आदेश चर्चा का विषय बना हुआ है। इस आदेश ने न केवल प्रशासनिक पदानुक्रम (Hierarchy) को ठेंगा दिखाया है, बल्कि भ्रष्टाचार की राह को और भी आसान बना दिया है। नए फरमान के तहत, अब करोड़ों रुपये के बजट वाली गौशालाओं के भौतिक सत्यापन और भुगतान की जिम्मेदारी ब्लॉक स्तर के राजपत्रित अधिकारियों के बजाय निचले स्तर के वेटरनरी कंपाउंडर (AVFO) को सौंप दी गई है।

वरिष्ठ अधिकारियों पर अविश्वास क्यों?

सरकारी तंत्र में पारदर्शिता के लिए आमतौर पर सत्यापन का अधिकार SDM, जनपद CEO या ब्लॉक वेटरनरी ऑफिसर (BVO) जैसे जिम्मेदार पदों के पास होता है। सवाल खड़ा होता है कि आखिर उपसंचालक महोदय को अपने ही विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और प्रशासनिक मुखिया (SDM) की अध्यक्षता वाली कमेटी पर भरोसा क्यों नहीं रहा? ब्लॉक की पूरी बॉडी को दरकिनार कर एक छोटे कर्मचारी को 'पॉवरफुल' बनाना सीधे तौर पर प्रशासनिक मर्यादाओं का उल्लंघन है।

भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश?

जिले में पहले से ही गौशालाएं चारे-भूसे के अभाव में दम तोड़ रही हैं। कागजों पर पल रहे गौवंश और अधूरी गौशालाओं के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट की खबरें आम हैं। जानकारों का आरोप है कि निचले स्तर के कर्मचारियों पर दबाव बनाना और उनसे मनमाफिक रिपोर्ट तैयार करवाना आसान होता है। ऐसे में क्या यह आदेश कमीशन का खेल सेट करने और फर्जीवाड़े को कानूनी कवच पहनाने की एक सोची-समझी रणनीति है?

पदानुक्रम का चित्र और प्रशासनिक ढांचा

सरकारी योजनाओं में जवाबदेही तय करने के लिए एक निश्चित पदानुक्रम होता है। जब इस श्रृंखला को तोड़ा जाता है, तो भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत होती हैं।

घेरे में साहब की कार्यप्रणाली

उपसंचालक का यह आदेश न केवल वित्तीय अनियमितताओं को बढ़ावा देगा, बल्कि उन बेजुबान गौवंशों के साथ भी क्रूरता है जो सही सत्यापन न होने के कारण दाने-दाने को तरस रहे हैं। यदि इस आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस नहीं लिया गया, तो जिले की गौशालाएं सरकारी खजाने में सेंध लगाने का सबसे बड़ा अड्डा बन जाएंगी। अब देखना यह है कि क्या जिला कलेक्टर इस 'तुगलकी फरमान' पर संज्ञान लेते हैं या गौवंश के नाम पर होने वाली यह लूट बदस्तूर जारी रहेगी?

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