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| रीवा पुलिस: रक्षक या भक्षक? लालगांव चौकी में 'सोने का अंडा' देने वाला केस और ₹13,000 की 'भैंस वसूली' ने उड़ाई विभाग की नींद Aajtak24 News |
रीवा - रीवा जिले का पुलिस विभाग इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर जनता के बीच चर्चा और आक्रोश का केंद्र बना हुआ है। गढ़ थाना अंतर्गत लालगांव चौकी से जुड़े भ्रष्टाचार के दो बड़े मामले सामने आए हैं, जिन्होंने खाकी की छवि पर गहरा दाग लगा दिया है। आरोप है कि जहाँ एक ओर लाखों के जेवरात कांड में 'सेवा शुल्क' का बड़ा खेल हुआ, वहीं दूसरी ओर एक गरीब से भैंस ले जाने के नाम पर वसूली की गई।
केस 1: ठगी का सोना और 'सेवा शुल्क' की मलाई
मामला नवंबर 2025 का है, जब एक शातिर युवक ने एक लड़की के परिवार का दर्जनों तोला सोना क्रमबद्ध तरीके से ठग कर बाजार में बेच दिया। जब परिवार को भनक लगी, तो पुलिस ने आरोपी को जेल तो भेज दिया, लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ। सूत्रों और जनचर्चा के अनुसार, जिन स्वर्णकारों (सुनारों) ने वह सोना खरीदा था, उन्हें पुलिस ने अपना 'शिकार' बनाया। आरोप है कि लालगांव चौकी और गढ़ थाने के कुछ चर्चित चेहरों, जिनमें एक प्रधान आरक्षक की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है, ने व्यापारियों को गंभीर धाराओं का डर दिखाकर लाखों रुपयों की वसूली की। जिन व्यापारियों ने 'मनमाफिक सेवा शुल्क' दिया उन्हें छोड़ दिया गया और बाकी को मुलजिम बना दिया गया।
केस 2: ₹13,000 की 'भैंस वसूली' और दागी चेहरों को तवज्जो
ताजा मामला जनवरी 2026 का है। एक गरीब व्यक्ति जब अपनी भैंस लेकर जा रहा था, तब आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उसे रोककर डराया-धमकाया और ₹13,000 ऐंठ लिए। यह घटना क्षेत्र में आग की तरह फैल गई है। चर्चा है कि जिन चर्चित और विवादित पुलिसकर्मियों को रीवा रेंज आईजी द्वारा 'चिन्हित' किया गया था, उन्हें सुधारने के बजाय महत्वपूर्ण थानों में पदस्थ किया गया है, जबकि ईमानदार अधिकारियों को पुलिस लाइन भेज दिया गया है।
सत्ताधारियों और प्रशासन को चेतावनी
जनता में व्याप्त यह आक्रोश आने वाले समय में सत्ताधारी दल (भाजपा) के लिए चिंता का विषय बन सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन ने इन 'दागी' पुलिसकर्मियों पर लगाम नहीं लगाई, तो "अंधेर नगरी चौपट राजा" वाली कहावत चरितार्थ होगी। भ्रष्टाचार का यह दीमक पुलिस के प्रति जनता के भरोसे को खोखला कर रहा है।
अधिकारियों का मौन: इस संबंध में जब विभाग के आला अधिकारियों से पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने चुप्पी साध ली। हालांकि समाचार इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं करता, लेकिन जनता के बीच उठ रहे सवाल और गोपनीय गुप्तचर जांच की मांग यह बताने के लिए काफी है कि पर्दे के पीछे बहुत कुछ काला है।
