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| विंध्य में 'खाकी' पस्त, 'खाऊ' मस्त? रीवा-मऊगंज में चोरों का तांडव और पुलिस की 'सादे कागज' वाली थ्योरी Aajtak |
रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश का विंध्य क्षेत्र, जो कभी अपनी मर्यादा और शांति के लिए जाना जाता था, आज अपराध की नई प्रयोगशाला बनता जा रहा है। रीवा और नवगठित जिला मऊगंज में कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ रही हैं। आलम यह है कि आम आदमी रात को चैन की नींद सोने के बजाय अपनी गाढ़ी कमाई और संपत्ति की रखवाली के लिए लाठियां लेकर पहरा देने को मजबूर है। पुलिस की सक्रियता केवल कागजों और आंकड़ों में सिमट कर रह गई है, जबकि धरातल पर अपराधी बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।
गढ़ थाना: अपराध का नया उप-केंद्र?
रीवा जिले के गढ़ थाना क्षेत्र में इन दिनों चोरों ने समानांतर सरकार चला रखी है। हालिया घटनाओं ने पुलिसिया गश्त के दावों की पोल खोल दी है।
केस 1: गढ़ बाईपास निवासी छोटेलाल नामदेव के कूप (कुएं) से 8 जनवरी 2026 को 2 HP की मोटर चोरी हो गई।
केस 2: हैरानी की बात यह है कि इसी छोटेलाल के घर को चोरों ने 31 दिसंबर 2025 को भी निशाना बनाया था, जहां से एक बोरी गेहूं और 1 HP की मोटर पार कर दी गई थी।
केस 3: लोरी नंबर-1 के निवासी रामनरेश पांडे के घर से भी आधा HP की मोटर चोरी हो गई।
इन तीनों मामलों में एक समानता है—पीड़ित थाने तो गए, लेकिन उन्हें न्याय के बजाय 'तसल्ली' का झुनझुना थमा दिया गया। सवाल यह है कि क्या पुलिस केवल बड़ी डकैती या हत्या का इंतजार कर रही है? क्या एक किसान के लिए उसकी मोटर और अनाज की कीमत पुलिस की नजर में शून्य है?
'बर्नी' (FIR) से बचती पुलिस और 'सादे कागज' का मायाजाल
इस जांच में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। पुलिस अब अपराध के आंकड़ों को कम दिखाने के लिए "डाटा मैनिपुलेशन" का सहारा ले रही है। नियमतः, किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस को CCTNS (Crime and Criminal Tracking Network & Systems) पर FIR दर्ज करनी चाहिए।
लेकिन गढ़ थाना और लालगांव चौकी में एक नया चलन शुरू हुआ है—'सफेद कागज का आवेदन'। पीड़ित से आवेदन ले लिया जाता है, उसे एक कच्ची रसीद थमा दी जाती है और उसे महीनों तक जांच के नाम पर टहलाया जाता है। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के 'ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार' मामले के निर्देशों की भी अवमानना है। आरोप है कि जब तक किसी रसूखदार का फोन न आए या कोई 'सुविधा शुल्क' न पहुंचे, तब तक FIR दर्ज होना मुमकिन नहीं है।
कबाड़ियों का सिंडिकेट: जहां नशा मिलता है और चोरी बिकती है
क्षेत्र में बढ़ती चोरी की वारदातों की जड़ में 'नशा और कबाड़' का घातक कॉकटेल है। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि नशीली सिरप और अन्य नशों के आदी युवा इन चोरियों को अंजाम देते हैं।
संरक्षण का खेल: चोरी की गई मोटरों को काट-छाँटकर स्थानीय कबाड़ियों को बेच दिया जाता है।
मौन स्वीकृति: जनता का खुला आरोप है कि कबाड़ियों और पुलिस के बीच एक निश्चित 'सेवा शुल्क' का मासिक लेनदेन होता है। यही कारण है कि पुलिस इन कबाड़ खानों पर कभी दबिश नहीं देती। यदि इन अवैध कबाड़ केंद्रों की सघन तलाशी ली जाए, तो जिले की आधी से ज्यादा चोरी की मोटरें बरामद हो सकती हैं।
विपक्ष की 'कुंभकरणी निद्रा' और सत्ता का 'विकास राग'
एक जीवंत लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका प्रहरी की होती है। लेकिन रीवा और मऊगंज में विपक्ष मानो 'राजनीतिक निर्वासन' पर चला गया है। 2004 से पहले का दौर याद करते हुए बुजुर्ग कहते हैं कि तब छोटी सी घटना पर भी चक्काजाम और घेराव होता था। आज विपक्षी दल केवल सोशल मीडिया तक सीमित हैं। सत्ता पक्ष विकास के बड़े-बड़े विज्ञापनों में व्यस्त है, लेकिन विकास की इस चमक के नीचे असुरक्षा का अंधेरा गहराता जा रहा है।
प्रशासन का मौन: स्वीकृति या अक्षमता?
जब इस संबंध में जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो हमेशा की तरह "मामला संज्ञान में है" या "जांच चल रही है" जैसे रटे-रटाए जवाब मिले। पुलिस की यह चुप्पी अपराधियों के लिए 'मौन सहमति' का काम कर रही है। मऊगंज जैसे नए जिले में, जहाँ बेहतर पुलिसिंग की उम्मीद थी, वहां की स्थिति रीवा से भी बदतर होती नजर आ रही है।
निष्कर्ष और चेतावनी
अगर रीवा और मऊगंज के पुलिस अधीक्षकों (SP) ने तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया और 'FIR फ्री-रजिस्ट्रेशन' की नीति लागू नहीं की, तो जनता का यह दबा हुआ गुस्सा जल्द ही उग्र आंदोलन का रूप ले सकता है। अपराधियों में पुलिस का 'इकबाल' खत्म होना किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरे की घंटी है। क्या प्रशासन तब जागेगा जब चोर थानों के भीतर से सामान ले जाना शुरू कर देंगे?
