रीवा-मऊगंज में 10 लाख क्विंटल धान का उठाव ठप: खुले आसमान के नीचे सड़ रहा 'सफेद सोना', ट्रांसपोर्टर्स की सुस्ती ने छीनी किसानों की नींद Aajtak24 News

 रीवा-मऊगंज में 10 लाख क्विंटल धान का उठाव ठप: खुले आसमान के नीचे सड़ रहा 'सफेद सोना', ट्रांसपोर्टर्स की सुस्ती ने छीनी किसानों की नींद Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - विंध्य क्षेत्र के किसानों के लिए इस वर्ष की धान खरीदी खुशियों के बजाय दुश्वारियां लेकर आई है। रीवा और नवनिर्मित मऊगंज जिले में धान खरीदी की प्रक्रिया सरकारी कुप्रबंधन और परिवहनकर्ताओं की मनमानी के कारण पटरी से उतर गई है। वर्तमान में दोनों जिलों को मिलाकर लगभग 10 लाख क्विंटल धान उठाव के इंतजार में केंद्रों पर ही डंप पड़ा है। हालात इतने खराब हैं कि संग्रहण केंद्रों पर अनाज रखने की जगह तक नहीं बची है।

आंकड़ों में संकट का विश्लेषण

सरकारी गोदामों और संग्रहण केंद्रों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। जिलेवार आंकड़े व्यवस्था की पोल खोलते नजर आ रहे हैं:

  • रीवा जिला: यहाँ लगभग 7.50 लाख क्विंटल धान का उठाव लंबित है।

  • मऊगंज जिला: यहाँ करीब 2.5 लाख क्विंटल धान केंद्रों पर ही फंसा हुआ है।

  • भंडारण की स्थिति: सबसे डरावनी बात यह है कि कुल लंबित स्टॉक का 65% हिस्सा खुले मैदानों (ओपन कैप) में पड़ा है। मात्र 35% धान ही गोदामों की छत के नीचे सुरक्षित है।

क्यों थमी है धान की रफ्तार?

पड़ताल में धान उठाव न होने के तीन प्रमुख कारण सामने आए हैं। पहला, परिवहनकर्ताओं की सुस्ती— ट्रांसपोर्टर्स द्वारा धान उठाने की गति कछुआ चाल से भी धीमी है। दूसरा, गोदामों में जगह का टोटा— पुराने स्टॉक का समय पर निपटान न होने से नए धान के लिए गोदामों में जगह ही नहीं बची है। तीसरा, तालमेल का अभाव— प्रशासनिक स्तर पर परिवहन और भंडारण एजेंसियों के बीच कोई प्रभावी समन्वय नहीं दिख रहा है, जिसका सीधा असर जमीनी स्तर पर पड़ रहा है।

किसानों की दोहरी मार: न पैसा, न सुरक्षा

शासन का नियम है कि खरीदी के 7 दिनों के भीतर किसान के खाते में भुगतान पहुंच जाना चाहिए, लेकिन जब तक धान का उठाव होकर वह गोदाम तक नहीं पहुंचता, भुगतान की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाती।

  • खराब होने का डर: खुले में रखे 6.5 लाख क्विंटल धान पर बेमौसम बारिश और बढ़ती नमी का खतरा मंडरा रहा है। अगर बारिश हुई, तो किसानों की सालभर की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी।

  • विरोध की गूँज: मऊगंज में खरीदी केंद्रों के अचानक बदलाव और बुनियादी सुविधाओं (पानी, बिजली) के अभाव ने किसानों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। यहाँ किसान लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

प्रशासनिक चेतावनी और भविष्य की रणनीति

संकट को बढ़ता देख जिला कलेक्टरों ने परिवहनकर्ताओं को कड़ी चेतावनी जारी की है और गोदाम खाली करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, शासन अब एक बड़े नीतिगत बदलाव की ओर देख रहा है। वर्तमान विकेंद्रीकृत खरीद प्रणाली (DCP) में आ रही वित्तीय और व्यावहारिक बाधाओं को देखते हुए सरकार अब केंद्रीयकृत प्रणाली (CPS) की ओर बढ़ने का विचार कर रही है, ताकि भुगतान सीधे और समय पर हो सके।

ग्राउंड जीरो से अनिल की टिप्पणी: > सवाल सिर्फ 10 लाख क्विंटल धान का नहीं है, सवाल उन हजारों परिवारों का है जिनकी पूरी साल की अर्थव्यवस्था इस धान पर टिकी है। यदि प्रशासन ने युद्धस्तर पर उठाव सुनिश्चित नहीं किया, तो यह 'सफेद सोना' बर्बाद हो जाएगा और किसान कर्ज के दलदल में धंस जाएगा।


 

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