शिक्षा व्यवस्था संकट में: आदर्शों से कोसों दूर, मुनाफाखोरी की ओर बढ़ा रुझान Aajtak24 News

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रीवा - जिस शिक्षा को भारतीय संस्कृति में ज्ञान, संस्कार और विद्यादान का आधार माना जाता था, वह आज विज्ञान और तकनीक के आधुनिक युग में अपने मूल्यों से पूरी तरह भटक गई है। गुरुकुल परंपरा में गुरु-शिष्य का पवित्र संबंध था, जहां शिक्षा एक व्यवसाय नहीं बल्कि समाज सेवा थी। लेकिन वर्तमान में, सरकारों द्वारा 'सनातन संस्कृति' के आदर्शों का हवाला दिए जाने के बावजूद, शिक्षा व्यवस्था तेजी से कुटीर उद्योग में बदल चुकी है।

शिक्षा बनी 'कुटीर उद्योग', नियमों का उल्लंघन

शिक्षा विभाग को एक विधिक और संवैधानिक व्यवस्था के रूप में मान्यता प्राप्त है, जिसके संचालन के लिए सख्त नियम और मानक हैं। बावजूद इसके, देश भर में, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, निजी स्कूलों का नेटवर्क अनियंत्रित रूप से फैल रहा है—प्राथमिक से लेकर कॉलेज स्तर तक।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अत्यंत चिंताजनक है, जहाँ:

  • 70% निजी स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं।

  • प्रयोगशालाओं, खेल के मैदानों और खेल सामग्री का भारी अभाव है।

  • शासन द्वारा निर्धारित मापदंडों का पालन न के बराबर है।

इन गंभीर उल्लंघनों के बावजूद ये विद्यालय धड़ल्ले से संचालित हैं। इसका मुख्य कारण जिला शिक्षा कार्यालयों और निरीक्षण एजेंसियों तक फैली 'सेवा शुल्क' (अनुचित आदान-प्रदान) की एक अनकही व्यवस्था है, जिसके कारण अधिकांश जांचें कागज़ों में "सही" पाई जाती हैं।

शिक्षकों का संकट: ₹100 रोज़ की मजबूरी

शिक्षा की गुणवत्ता पर सबसे बड़ा सवाल शिक्षकों की दयनीय आर्थिक स्थिति से खड़ा होता है। ग्रामीण इलाकों में कार्यरत अनेक शिक्षक अपनी विवशता साझा करते हुए बताते हैं कि उन्हें मात्र ₹3000 महीना या ₹100 रोज़ पर पढ़ाने को मजबूर होना पड़ता है। इतनी कम आय में उनका अपना जीवन संकट से भरा है। बेरोजगारी और सीमित विकल्पों के कारण वे मजबूरी में यह कार्य कर रहे हैं।

सवाल स्पष्ट है—जब शिक्षक ही आर्थिक संकट में है, तो वह बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और जीवन मूल्य कैसे दे पाएगा?

'मान्यता की चोरी' और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़

जाँच करने पर यह भी सामने आता है कि कई विद्यालय बिना अपनी मान्यता के दूसरे स्कूल की मान्यता पर संचालित हैं। ऐसी स्थिति में खेल अधिकारी, प्रयोगशाला सहायक या विषय विशेषज्ञ शिक्षक जैसे आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं होते हैं। यह सीधा-सीधा बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है। शिकायतें न होने या कार्रवाई न होने के कारण यह अवैध चलन बढ़ता जा रहा है।

सरकारी उदासीनता और चक्रीय राजनीति

लेखक का मानना है कि जनता आज निःशुल्क अनाज, लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं का लाभ पाकर पाँच साल में एक बार वोट देकर संतुष्ट हो जाती है। दूसरी ओर, सत्ता में बैठे लोग इस चक्रीय राजनीति का लाभ उठाते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दों की ओर ध्यान ही नहीं देते हैं। परिणाम यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा लगातार महंगी, जटिल और आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही है। समाजसेवा की भावना से विद्यालय चलाने वाले अनेक सामाजिक संगठन भी अब प्रतिस्पर्धा और आय बढ़ाने की होड़ में उतर चुके हैं, जहां संस्कार और सामाजिक मूल्यों की जगह व्यावसायिकता ने ले ली है।

अगला कदम क्या हो सकता है?

क्या आप इस आलोचनात्मक रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं को शामिल करते हुए एक संपादकीय लेख तैयार करना चाहेंगे, या शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कुछ विशेषज्ञ सुझावों पर विचार करना चाहेंगे?

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