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| रीवा-मऊगंज में भ्रष्टाचार का 'लोकतंत्र': कमीशनखोरी के अनुमानित आंकड़े डराने वाले, विकास की नींव पड़ रही कमजोर Aajtak24 News |
रीवा - स्वतंत्र भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का गौरव प्राप्त है। लोकतंत्र की जड़ें हमारी सबसे बड़ी इकाई से लेकर सबसे छोटी इकाई तक फैली हुई हैं। देश की विकास रूपरेखा संसद से लेकर ग्राम पंचायत तक तय होती है। लोकतंत्र की यह संरचना लोकसभा, विधानसभा, जिला पंचायत, जनपद पंचायत और ग्राम पंचायत के माध्यम से संचालित होती है। इन्हीं इकाइयों के जरिए देश, प्रदेश, जिला और गांवों का भविष्य निर्धारित होता है। यह कहना सर्वथा उचित होगा कि सभी जनप्रतिनिधि एक समान नहीं हैं। आज भी अनेक ऐसे जनप्रतिनिधि हैं, जिन्होंने अपनी ईमानदारी, निष्ठा और जनसेवा से लोकतंत्र की गरिमा को ऊंचा रखा है। रीवा जिले में भी अतीत में ऐसे आदर्श व्यक्तित्व देखने को मिले हैं, जिनमें स्व. कुमार रुक्मणी रमन प्रताप सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी छवि आज भी बेदाग मानी जाती है। उन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया, संपत्ति अर्जित करने का साधन नहीं। वर्तमान समय में भी कुछ जनप्रतिनिधि ईमानदारी की मिसाल कायम किए हुए हैं।
किन्तु इसके विपरीत, रीवा और मऊगंज जिले में कुछ जनप्रतिनिधियों को लेकर भ्रष्टाचार की चर्चाएं आम हो चली हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कुछ लोग खुलेआम यह कहते सुने जाते हैं कि “पंचायत में 15 लाख रुपये तक का भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार नहीं कहलाता।” यदि एक ग्राम पंचायत में 15 लाख का आंकलन हो, तो जनपद स्तर पर यह राशि 30 लाख, जिला स्तर पर 60 से 70 लाख, विधानसभा स्तर पर 1 करोड़ 20 लाख और लोकसभा क्षेत्र में 2 करोड़ 40 लाख रुपये से अधिक तक पहुंच सकती है। यह केवल एक अनुमान है, किंतु सोचने पर विवश करता है कि यदि यही मानसिकता बनी रही, तो विकास निधियों का वास्तविक उपयोग कितना हो रहा होगा? आज पंचायतों से लेकर बड़े विभागों तक, कमीशनखोरी की चर्चाएं आम हैं। यात्री प्रतीक्षालय, पानी की टंकी, सड़क निर्माण, भवन निर्माण, हैंडपंप स्थापना—इन सभी कार्यों में “कमीशन” शब्द जुड़ चुका है। यदि इन योजनाओं की निष्पक्ष जांच हो, तो अनेक अनियमितताएं उजागर हो सकती हैं। सवाल यह है कि आम व्यक्ति को न्याय पाना महंगा और कठिन क्यों पड़ता है?
अब बात कर्मचारियों और अधिकारियों की। यह भी सत्य है कि आज भी अनेक विभागों में ईमानदार और निष्ठावान अधिकारी मौजूद हैं। किंतु विडंबना यह है कि ऐसे अधिकारियों को अक्सर “लूप लाइन” में डाल दिया जाता है, जबकि जो अधिक “सेवा शुल्क” देने या राजनीतिक चरण वंदना करने में सक्षम होते हैं, उन्हें महत्वपूर्ण और मलाईदार पदों पर पदस्थ किया जाता है। शिक्षा विभाग में बाबूगिरी के नाम पर अटैचमेंट, लोक निर्माण विभाग में सड़क-पुलिया निर्माण की गुणवत्ता, राजस्व न्यायालयों की लंबित फाइलें—इन सबकी स्थिति किसी से छिपी नहीं है। राजस्व विभाग में पटवारी से लेकर तहसीलदार तक की अपनी सीमाएं तय हो चुकी हैं। लोकायुक्त कार्रवाई करता है, शिकायतें दर्ज होती हैं, किंतु व्यवस्था की जटिलता में आम नागरिक की आवाज अक्सर दब जाती है। स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास, लोक निर्माण, परिवहन—कौन सा विभाग है जहां भ्रष्टाचार की चर्चा नहीं होती? सबसे चिंताजनक विषय यह है कि पोस्टिंग और प्रमोशन भी अब कथित “सेवा शुल्क” से जुड़ते दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप नेता और अधिकारी, दोनों वर्गों की आय में असामान्य वृद्धि की चर्चाएं जनमानस में हैं। जनता में भय और निराशा का वातावरण बनता जा रहा है। जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलता है, वह अक्सर निशाने पर आ जाता है।
समाचार पत्र और मीडिया, जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाते हैं, वे भी कभी-कभी विज्ञापन और दबाव की राजनीति के बीच अपनी स्वतंत्रता खोते दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचार पर निर्भीक आवाज उठाने की अपेक्षा आज पहले से अधिक है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देश के वीर सेनानियों ने जिस लोकतंत्र की परिकल्पना की थी, वह त्याग, बलिदान और आदर्शों पर आधारित था। उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर जिस व्यवस्था को स्थापित किया, उसका उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि जनकल्याण था। किंतु आज की राजनीति में “लोकतंत्र” कहीं “वोट तंत्र” और “सत्ता तंत्र” में परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है, जहां मुख्य उद्देश्य सरकार पर बैठना भर रह गया है।
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, मीडिया और आम नागरिक—सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता का भी नाम है। यदि समय रहते सुधार की पहल नहीं की गई, तो जनता का विश्वास डगमगा सकता है। धन्य है लोकतंत्र—यदि वह जनहित में कार्य करे। अन्यथा इतिहास गवाह है, जनता जब जागती है तो व्यवस्था को बदलने में देर नहीं लगती।
