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| RSS के 100 साल: PM मोदी ने जारी किया ऐतिहासिक सिक्का और डाक टिकट Aajtak24 News |
नई दिल्ली - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित शताब्दी समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। दिल्ली के डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में हुए इस गरिमामय कार्यक्रम में पीएम मोदी ने संघ के राष्ट्र निर्माण में योगदान को रेखांकित करते हुए एक विशेष स्मारक डाक टिकट और ₹100 का स्मृति सिक्का जारी किया। अपने संबोधन में, प्रधानमंत्री ने संघ की 100 वर्षों की गौरवशाली यात्रा को न सिर्फ त्याग, निस्वार्थ सेवा और अनुशासन का असाधारण उदाहरण बताया, बल्कि यह भी स्वीकार किया कि इस यात्रा में संघ को कुचलने के अनगिनत प्रयास और साजिशें हुईं, जिन पर संघ ने अपने दृढ़ निश्चय और 'राष्ट्र प्रथम' की भावना से विजय पाई।
'राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार': संघ की 100 वर्ष की यात्रा
प्रधानमंत्री मोदी ने संघ की स्थापना को "हजारों वर्षों से चली आ रही उस परंपरा का पुनरुत्थान" बताया, जिसमें राष्ट्र चेतना समय-समय पर चुनौतियों का सामना करने के लिए नए अवतारों में प्रकट होती है। उन्होंने कहा कि "इस युग में संघ उसी अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार है।"
पीएम ने कहा कि संघ ने अपने गठन के बाद से ही राष्ट्र निर्माण का विराट उद्देश्य लेकर चला और इसके लिए व्यक्ति निर्माण का रास्ता चुना। उन्होंने संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वे जानते थे कि राष्ट्र तभी सशक्त होगा, जब हर व्यक्ति में राष्ट्र के प्रति दायित्व का बोध जागृत होगा। प्रधानमंत्री ने संघ की शाखाओं को व्यक्ति निर्माण की 'यज्ञ वेदी' बताते हुए कहा कि यह वही प्रेरणा भूमि है जहाँ स्वयंसेवक की यात्रा 'अहं से वयं' तक शुरू होती है, यानी स्वयं से उठकर सामूहिक राष्ट्रीय चेतना तक पहुँचती है।
स्मारक सिक्का और डाक टिकट की ऐतिहासिक विशेषता
इस अवसर पर जारी किए गए विशेष स्मारक सिक्के और डाक टिकट को पीएम मोदी ने ऐतिहासिक बताया।
₹100 का सिक्का: प्रधानमंत्री ने इस सिक्के की विशेषता बताते हुए कहा कि यह संभवतः स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है जब किसी भारतीय मुद्रा पर सिंह के साथ वरद-मुद्रा में भारत माता की भव्य छवि अंकित की गई है। इस छवि में स्वयंसेवकों को श्रद्धा और समर्पण के साथ भारत माता को नमन करते हुए दिखाया गया है। सिक्के पर संघ का बोधवाक्य 'राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम' भी अंकित है, जिसका अर्थ है 'यह राष्ट्र के लिए समर्पित है, यह मेरा नहीं', जिसे उन्होंने राष्ट्रीय भावना का आधार बताया।
डाक टिकट: पीएम ने कहा कि यह डाक टिकट उन स्वयंसेवकों की झलक प्रस्तुत करता है जो अनवरत रूप से देश की सेवा और समाज को सशक्त करने में जुटे हैं। उन्होंने 1963 की 26 जनवरी की परेड का विशेष उल्लेख किया, जिसमें RSS के स्वयंसेवक शामिल हुए थे और "आन-बान-शान से राष्ट्रभक्ति की धुन पर कदमताल" किया था। इस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति भी डाक टिकट में अंकित है।
हमलों और साजिशों का दो टूक जवाब
प्रधानमंत्री मोदी ने संघ के इतिहास के संघर्षों को भी बड़ी बेबाकी से सबके सामने रखा। उन्होंने कहा, "राष्ट्र साधना की इस यात्रा में ऐसा नहीं है कि संघ पर हमले नहीं हुए, संघ के खिलाफ साजिशें नहीं हुईं।" उन्होंने आजादी के बाद संघ को कुचलने के प्रयासों और मुख्यधारा में आने से रोकने के षड्यंत्रों का जिक्र किया।
पीएम मोदी ने परमपूज्य गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) को झूठे केस में फँसाए जाने और उन्हें जेल भेजे जाने की घटना को याद किया। उन्होंने गुरुजी के सहज उत्तर को इतिहास की बहुत बड़ी प्रेरणा बताया, जब उन्होंने कहा था, "कभी-कभी जीभ दांतों के नीचे आकर दब जाती है, कुचल भी जाती है, लेकिन हम दांत नहीं तोड़ देते हैं, क्योंकि दांत भी हमारे हैं और जीभ भी हमारी है।" इस उदाहरण के माध्यम से पीएम ने बताया कि संघ ने कभी भी कटुता को स्थान नहीं दिया और लोकतंत्र तथा संवैधानिक संस्थाओं में अपना अडिग विश्वास बनाए रखा।
राष्ट्रभक्ति और सेवा का पर्याय
प्रधानमंत्री ने कहा कि संघ प्रारंभ से ही राष्ट्रभक्ति और सेवा का पर्याय रहा है। उन्होंने विभाजन की पीड़ा के दौरान लाखों शरणार्थियों की सेवा, 1984 के सिख नरसंहार के दौरान सिख परिवारों को शरण देने और हाल ही में कोविड महामारी के दौरान स्वयंसेवकों के साहस और सेवा की सराहना की। पीएम ने बताया कि संघ उन दुर्गम और कठिन क्षेत्रों में भी कार्य करता रहा है, जहाँ सरकारों ने लंबे समय तक प्राथमिकता नहीं दी। उन्होंने देश के लगभग 10 करोड़ आदिवासी भाई-बहनों के कल्याण के लिए सेवा भारती, विद्या भारती, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संघ के सहयोगी संगठनों को सशक्तिकरण का स्तंभ बताया।
समारोह के अंत में, पीएम मोदी ने महानवमी और विजयादशमी की बधाई देते हुए कहा कि विजयादशमी भारतीय संस्कृति के 'अन्याय पर न्याय, असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की जीत' के विचार और विश्वास का कालजयी उद्घोष है, और ऐसे महान पर्व पर संघ की स्थापना कोई संयोग नहीं था। उन्होंने वर्तमान 'स्वयंसेवक पीढ़ी' को सौभाग्यशाली बताया कि उन्हें संघ के शताब्दी वर्ष का महान अवसर देखने को मिल रहा है।
