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| श्रद्धा का महाकाव्य, रीवा में प्रवाहित हुई भक्ति की धवलधारा Aajtak24 News |
रीवा - रीवा की पुण्यभूमि ने एक बार फिर अपने आध्यात्मिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखे जाने योग्य दृश्य का साक्षात्कार किया। कोठी शिवधाम से प्रवाहित हुई चुनरी की गंगा केवल कपड़े की एक लंबी पट्टी नहीं थी, यह समूचे नगर की सामूहिक चेतना का प्रवाह थी, जो भक्ति, संस्कृति और सामाजिक समरसता की त्रिवेणी के रूप में बह रही थी। कोठी शिव मंदिर का प्रांगण मानो देवभूमि में परिणत हो गया था, जहाँ सायंकालीन सूर्य की सुनहरी आभा और शंखध्वनि से गूँजते मंत्रोच्चार मिलकर ऐसा वातावरण निर्मित कर रहे थे, मानो किसी युगान्तकारी आध्यात्मिक महोत्सव का शुभारंभ हो रहा हो। जैसे ही उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने अपने करकमलों से 51 मीटर लंबी चुनरी का स्पर्श कर यात्रा को गति दी, वैसे ही श्रद्धा का ज्वार उमड़ पड़ा। वह क्षण मानो गंगा अवतरण की पुनरावृत्ति जैसा था- एक ऐसा क्षण, जिसने समूचे नगर को तीर्थ में रूपांतरित कर दिया।
यह यात्रा केवल कोठी से माँ काली के दरबार तक की भौगोलिक दूरी न थी, बल्कि यह नगरवासियों के अंतःकरण से निकलकर सामूहिक आस्था की पराकाष्ठा तक पहुँचने वाली आध्यात्मिक यात्रा थी। शिल्पी प्लाज़ा, कला मंदिर रोड, अस्पताल चौराहा, धोबिया टंकी- हर मार्ग, हर चौक, हर गली श्रद्धा के रंग में रंगी हुई प्रतीत हो रही थी। जिन गलियों में साधारण दिनों में धूल उड़ती है, वहाँ आज भक्ति के पुष्प बिछे थे, और हर आँख में आस्था की आभा झलक रही थी। सबसे अद्भुत दृश्य था नगर की मातृशक्ति का महासंगम। जिन हाथों ने आज तक केवल घर की चौखट सँभाली, वे हाथ आज चुनरी थामे नगर की राहों पर थे। यह भारतीय संस्कृति के उस शाश्वत सत्य की पुनः पुष्टि थी कि नारी ही वह आधारशिला है, जिस पर धर्म, संस्कृति और समाज की संपूर्ण इमारत खड़ी है। वे ही कभी दुर्गा बन कर रक्षा करती हैं, तो कभी पार्वती बन कर स्नेह का विस्तार करती हैं।
अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. विजय मोहन तिवारी का स्वागत- संस्कार और आभार प्रदर्शन भी इस आध्यात्मिक महोत्सव का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बना। उन्होंने इस सफलता का श्रेय मातृशक्ति के समर्पण को देते हुए कहा कि यही वह ऊर्जा है, जो किसी भी आयोजन को जनांदोलन में परिवर्तित कर देती है। राजनीति, समाज और संस्कृति के अनेक गणमान्य चेहरे इस यात्रा के साक्षी बने पंडित दलवीर द्विवेदी, पंडित राकेश शर्मा, डॉ. प्रभाकर चतुर्वेदी, वेंकटेश पांडे, प्रमोद व्यास, मनीषा पाठक सहित अनेक प्रतिष्ठित हस्तियाँ इस आस्था यात्रा में सम्मिलित हुईं। यह केवल सहभागिता नहीं थी, बल्कि यह नगर की सामूहिक आत्मा का उत्सव था, जिसने रीवा को पुनः यह स्मरण करा दिया कि जब श्रद्धा जागती है, तब वह जाति, वर्ग और विचारधारा के सभी भेदों को मिटाकर समाज को एक सूत्र में बाँध देती है।
आज की यह चुनरी यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रही। यह रीवा की आत्मा का महाकाव्य बन चुकी है- एक ऐसा महाकाव्य, जिसकी गूँज आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती रहेगी कि आस्था जब संगठित होती है, तो वह पत्थर को भी देवत्व दे सकती है। यह यात्रा इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा है।

