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| शिकायत की अभिव्यक्ति या अभिव्यक्ति पर शिकंजा? सरकार का ‘ब्लैकलिस्ट’ विवाद झूठ में सच भी दवा Aajtak24 News |
रीवा - मध्य प्रदेश के रीवा मऊगंज जिले में जब से 181 की सेवा प्रारंभ हुआ है इसका जनता के लिए काफी सुविधा थी किंतु दुरुपयोग के कारण सरकार को बाध्यता से ऐसा कठोर कदम उठाना पड़ा किंतु आज तक कितनी झूठी शिकायतें हुई कितनी 181 में कार्यवाही हुई क्या अब इसकी समीक्षा होगी क्या पूर्व 181 की की गई शिकायतों पर जो सत्यता पाई गई है देखा जाएगा क्या कार्यवाही सरकार करती है। मध्यप्रदेश सरकार ने एक ऐसा प्रशासनिक अस्त्र तैयार किया है जो लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत, शिकायत का अधिकार- को ही संदेह की कठघरे में खड़ा कर देता है। लोक सेवा प्रबंधन विभाग का यह निर्देश, जिसमें सभी कलेक्टरों को ‘आदतन’ और ‘झूठी’ शिकायतें दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ताओं की एक सूची तैयार करने को कहा गया है, प्रशासनिक संवेदनशीलता के बजाय एक सुरक्षात्मक कवच बनाने का प्रयास लगता है। यह कदम, जिसके पीछे शिकायत तंत्र के दुरुपयोग को रोकने का औचित्य दिखाया जा रहा है, वास्तव में एक ऐसी निगरानी व्यवस्था की नींव रखता है जहाँ आम आदमी की आवाज़ पर ‘विश्वसनीयता’ का ताला जड़ दिया जाएगा।
सरकारी भाषा में इसे ‘आदतन शिकायतकर्ताओं’ की पहचान करना बताया जा रहा है। किंतु, यह शब्दावली ही एक गहरे पूर्वाग्रह को जन्म देती है। क्या बार- बार शिकायत करना ही ‘आदतन’ होने का प्रमाण है? क्या यह संभव नहीं कि एक नागरिक लगातार हो रही प्रशासनिक उपेक्षा के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद कर रहा हो? सरकार का यह निर्देश उसी नागरिक को प्रथम दृष्टया ‘संदिग्ध’ ठहराता है। जिस सीएम हेल्पलाइन को जनता की सेवा और शिकायतों के त्वरित निवारण के लिए बनाया गया था, उसी के डेटा का इस्तेमाल अब एक ‘ब्लैकलिस्ट’ तैयार करने में किया जाएगा। यह ऐसा ही है जैसे कोई डॉक्टर मरीज का इलाज करने के बजाय, बार- बार आने वाले मरीजों की सूची बनाकर उन्हें ‘बीमारी का ढोंगी’ घोषित कर दे।
सबसे गंभीर चिंता का विषय यह है कि ‘झूठी शिकायत’ का फैसला कौन करेगा? क्या वही अधिकारी, जिनके कार्य- व्यवहार पर शिकायत दर्ज की गई है, अपने विरुद्ध लगे आरोपों को ‘झूठा’ घोषित करने का अधिकारी भी होंगे? यह तो फौजदारी न्याय प्रणाली के मूलभूत सिद्धांत- ‘निर्दोष तब तक सिद्ध है जब तक अपराधी सिद्ध न हो’- के विपरीत है। यहाँ तो शिकायतकर्ता को ही प्रारंभ से ही ‘संभावित अपराधी’ मान लिया जाएगा। यह प्रक्रिया नागरिकों और प्रशासन के बीच के विश्वास के अंतिम तारों को भी तोड़ने का काम कर सकती है। निस्संदेह, शिकायत तंत्र के दुरुपयोग के मामले हो सकते हैं, और उन पर अलग से कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन एक सामान्यीकृत ‘वॉचलिस्ट’ बनाना एक खतरनाक मिसाल कायम करता है। इससे उन हज़ारों नागरिकों का मनोबल टूटेगा जो ईमानदारी से व्यवस्था में अपना विश्वास रखते हुए शिकायतें दर्ज कराते हैं। भविष्य में, कोई भी नागरिक किसी अधिकारी के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने से पहले इस डर से हिचकिचाएगा कि कहीं उसका नाम किसी ‘ब्लैकलिस्ट’ में तो नहीं डाल दिया जाएगा, जिसके बाद उसकी भविष्य की किसी भी वैध शिकायत को भी संदेह की नज़र से देखा जाएगा।
यह नीति प्रशासन को जवाबदेह बनाने के बजाय, उसे और अधिक अभेद्य बनाने का काम करेगी। यह सरकार और जनता के बीच एक दीवार खड़ी करती है, न कि एक पुल। सरकार को यह समझना होगा कि एक पारदर्शी और उत्तरदायी व्यवस्था ही दुरुपयोग को रोकने की सबसे बड़ी गारंटी है, न कि नागरिकों पर निगरानी रखने वाली कोई ‘गुप्तचर सूची’। शिकायतें यदि बढ़ रही हैं, तो इसका समाधान शिकायतकर्ताओं को चिह्नित करना नहीं, बल्कि उन शिकायतों के मूल कारणों- प्रशासनिक जड़ता, भ्रष्टाचार और उदासीनता को दूर करना है। अंततः, यह प्रश्न छोड़ जाता है, क्या सरकार वास्तव में शिकायतों के निवारण में सुधार चाहती है, या फिर केवल शिकायतों की संख्या को सांख्यिकीय रूप से कम दिखाना चाहती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में, नागरिक की आवाज़ को ‘डेटा पॉइंट’ नहीं, बल्कि सुधार का एक अवसर माना जाना चाहिए। वरना, यह सूची शिकायतों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज़ को दर्ज करने का काम करेगी।
