पांच साल से 'गड्ढे' में अटकी सड़कें, मऊगंज-करौंदा मार्ग की हालत बदतर
रीवा जिले की सड़कों की हालत इतनी दयनीय है कि स्थानीय लोग इन्हें 'खाई' में तब्दील बता रहे हैं। मऊगंज से बुडबा करौंदा मार्ग और भीटी कोलाइया मार्ग की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। पांच वर्षों से इन सड़कों पर एक तगाड़ी गिट्टी भी नहीं डाली गई है। मानसून के दौरान इन सड़कों पर ट्रैक्टर चलाना भी मुश्किल हो जाता है, ऐसे में सामान्य वाहनों का गुजरना तो दूर की कौड़ी है। इन सड़कों की दुर्दशा को देखते हुए ग्रामीण अंचल के लोग अब पैदल चलना ही अपनी नियति मान चुके हैं।
कार्यपालन यंत्री नितिन पटेल पर गंभीर आरोप: कमीशनखोरी और टेंडर में धांधली का खेल?
जनता की आवाज़ और सोशल मीडिया पर उभर कर सामने आ रही चर्चाओं के अनुसार, लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री नितिन पटेल पर गंभीर आरोप लग रहे हैं।
चहेते ठेकेदारों का बोलबाला: आरोप है कि नितिन पटेल अपने कुछ चहेते रिश्तेदारों के नाम पर खुद ही ठेकेदार बने हुए हैं या उनके माध्यम से काम करवा रहे हैं।
संदिग्ध टेंडर प्रक्रिया: "55/माइनस" में जारी किए गए टेंडर प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जो साफ तौर पर दर्शाते हैं कि या तो काम की गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है या फिर कमीशन के खेल के लिए नियमों को ताक पर रखा जा रहा है। ऐसा लगता है कि पुराने सहयोगी अधिकारियों के साथ मिलकर काम को "हज़म" करने का अनूठा तरीका अपनाया जा रहा है।
कमीशन लेकर भुगतान: आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि नितिन पटेल ने कार्यभार ग्रहण करते ही कुछ ठेकेदारों के पुराने भुगतान कमीशन लेकर किए हैं, जो विभागीय नियमावली और नैतिकता दोनों के विरुद्ध है।
VIP संस्कृति में लिप्त: यह भी कहा जा रहा है कि नितिन पटेल की दिलचस्पी केवल VIP प्रोग्रामों में भाग लेने और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं में है, न कि आम जनता की समस्याओं और सड़कों की गुणवत्ता में।
मंत्री राकेश सिंह के अलावा किसी की नहीं सुनते: चर्चा है कि नितिन पटेल विभागीय मंत्री राकेश सिंह के अलावा किसी अन्य की नहीं सुनते, और रीवा की जनता की समस्याओं या विकास कार्यों से उनका कोई सरोकार नहीं है।
मुख्यमंत्री से जनता की गुहार: 'सड़क, पानी के बाद अब यहां भी ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं!'
जनता के बीच यह आक्रोश इस हद तक है कि वे महसूस कर रहे हैं कि सड़क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के बाद अब निर्माण कार्यों में भी उन्हें ठगा जा रहा है। आरोप है कि मुख्यमंत्री स्वयं जनता के बीच जाकर जमीनी हकीकत नहीं देखते, न ही रीवा की सड़कों, भवनों और पुलों के निर्माण में हो रहे घटिया काम की गुणवत्ता की जांच करते हैं। ठेकेदार लोक निर्माण विभाग की स्वेच्छाचारिता के संचालक बने हुए हैं, और भुगतान व कमीशनखोरी का खेल बिना किसी रोक-टोक के जारी है।
ठेकेदारों की मनमानी पर अंकुश कब?
सवाल यह उठता है कि क्या सरकार की नीतियां सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? जब ठेकेदार मनमानी कर रहे हैं, गुणवत्ता से समझौता हो रहा है, और obras की लागत के बावजूद काम खस्ताहाल है, तो ऐसे में आम आदमी कहां जाए? यह स्थिति न केवल सरकारी तंत्र पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि जनता के विश्वास को भी तोड़ती है। यह समय है कि मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्री इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराएं, obras में पारदर्शिता लाएं और उन अधिकारियों व ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई करें जो जनता के पैसे और विश्वास के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। रीवा की जनता सड़कों की दुर्दशा और निर्माण घोटालों पर अब और चुप नहीं रह सकती।