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| खाद संकट से मचा हाहाकार: भूखे-प्यासे किसानों पर लाठियां, प्रशासन की चुप्पी ने बढ़ाई बेचैनी Aajtak24 News |
रीवा - सहित विंध्य अंचल इन दिनों खाद संकट की मार झेल रहा है। खरीफ और रबी दोनों सीजन में किसानों की खाद आवश्यकता को लेकर प्रशासनिक तैयारियां पूरी तरह फेल साबित हो रही हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब तक न तो कृषि विभाग और न ही जिला प्रशासन ने यह स्पष्ट किया कि 1 जून से 30 सितंबर तक खरीफ के दौरान तथा 1 अक्टूबर से 1 जनवरी तक रबी के दौरान कितनी डीएपी, यूरिया या अन्य खाद की खपत हुई। आंकड़ों पर पर्दा डालकर प्रशासन सिर्फ़ जिम्मेदारी से बच रहा है।
कागज़ी दावों में दबे किसान
कृषि विभाग के पास यह बताने के लिए कोई ठोस आँकड़ा तक नहीं है कि जिले में कुल कितने बोरे खाद की आपूर्ति हुई और कितनी खपत हुई। किसानों का आरोप है कि खाद की वास्तविक उपलब्धता का ब्यौरा सार्वजनिक न करके अधिकारियों ने बिचौलियों और काला बाज़ारियों को खुला मैदान दे दिया है। यही वजह है कि मंडियों और सहकारी समितियों में किसान 24-24 घंटे भूखे-प्यासे लाइन में खड़े रहते हैं, फिर भी उन्हें खाद नहीं मिलती।
बिचौलियों की साजिश: किसान फिर बने शिकार
गांव-गांव से किसान खाद के लिए मंडियों तक पहुँचते हैं, लेकिन वहां अक्सर अफरातफरी और भगदड़ का माहौल बन जाता है। किसानों का कहना है कि यह सब बिचौलियों की सुनियोजित साजिश है। असली किसानों को लाइन से खदेड़कर खाद उठा ली जाती है और फिर वही खाद सात से आठ सौ रुपये अतिरिक्त दाम पर खुले बाजार में बेची जाती है। यह काला बाज़ार न केवल किसानों का आर्थिक शोषण है, बल्कि प्रशासन की नाकामी और मिलीभगत की गवाही भी देता है।
करहिया मंडी में लाठीचार्ज: अंग्रेज़ी हुकूमत की याद
स्थिति तब और भयावह हो गई जब रीवा की करहिया मंडी में खाद लेने पहुंचे किसानों पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें और वीडियो इस घटना की गवाही दे रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि "अराजक तत्वों" को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया गया, लेकिन हकीकत यह है कि कई निर्दोष किसान पुलिस की लाठियों का शिकार बने। किसान सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह लोकतंत्र है या अंग्रेज़ों का जमाना, जब जनता की आवाज़ दबाने के लिए लाठियां चलाई जाती थीं।
नेताओं की चुप्पी पर सवाल
किसानों की पीड़ा पर नेताओं की चुप्पी भी अब सवालों के घेरे में है। विपक्ष में रहते हुए जो नेता किसानों के नाम पर सड़कों पर उतरते थे, वही अब सत्ता में रहते हुए खामोश हैं। किसानों का आरोप है कि जनप्रतिनिधियों को केवल भाषण देने और तस्वीरें खिंचवाने की चिंता है, न कि किसानों की वास्तविक समस्या की। किसानों का दर्द है—“क्या हमारी पीड़ा सिर्फ़ बिस्किट और ट्रॉफी देकर मिटाई जाएगी?”
आंदोलन की तैयारी, 7 सितंबर को जनसैलाब
खाद संकट और लाठीचार्ज से आक्रोशित किसान संगठनों ने अब बड़ा आंदोलन खड़ा करने की तैयारी कर ली है। 7 सितंबर को रीवा-मऊगंज क्षेत्र में हजारों किसानों के सड़कों पर उतरने की संभावना है। किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो यह आंदोलन केवल खाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासन और सरकार की नीतियों के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन का रूप लेगा।
किसानों की चेतावनी: वोट से देंगे जवाब
कई किसानों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जिस तरह उन्हें अपमानित किया गया है, उसका बदला वे वोट से जरूर चुकाएँगे। किसानों का कहना है—“आज हमें डंडे मिले हैं, कल चुनाव में हम इसी डंडे का जवाब अपने वोट से देंगे।”
