रीवा में स्वास्थ्य व्यवस्था: कागजी क्लीनिक और जमीनी धोखा। Aajtak24 News

रीवा में स्वास्थ्य व्यवस्था: कागजी क्लीनिक और जमीनी धोखा। Aajtak24 News

रीवा - आधुनिक चिकित्सा के नाम पर मरीजों के साथ हो रहा है खुला खिलवाड़। मध्य प्रदेश सरकार की 'शहरी संजीवनी क्लीनिक' और 'ग्रामीण प्राथमिक एवं उपस्वास्थ्य केंद्र' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं की पोल खुल गई है। ये योजनाएं सरकारी फाइलों में तो चमकती हैं, लेकिन जमीन पर इनकी हालत जर्जर और शर्मनाक है। स्वराज एक्सप्रेस की टीम ने जब रीवा जिले के इन स्वास्थ्य केंद्रों का मुआयना किया, तो सामने आई वही पुरानी और दुखद तस्वीर- बंद दरवाजे, ताले लगे कमरे, गायब डॉक्टर और मरीजों की बेबसी। रानी तालाब और चौरहटा स्थित संजीवनी क्लीनिक हों या भोलगढ़ का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और करहिया क्रमांक-2 का उपस्वास्थ्य केंद्र- हर जगह एक जैसा सन्नाटा और उपेक्षा का माहौल।

सरकारी कागजात में इन केंद्रों पर डॉक्टर, फार्मासिस्ट, नर्सिंग स्टाफ की नियुक्ति का ढोंग रचा गया है, लेकिन हकीकत यह है कि यहां कभी- कभार सपोर्ट स्टाफ की मौजूदगी भी भाग्य से मिलती है। डॉक्टर तो अपनी निजी प्रैक्टिस में व्यस्त हैं, और सरकारी वेतन और सुविधाओं का मजा ले रहे हैं। मरीजों को फार्मासिस्ट या सपोर्ट स्टाफ ही पर्ची लिखकर दवा थमा देते हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि मानवीय जीवन के साथ खिलवाड़ है। एक महिला मरीज का कटु सत्य- "संजीवनी क्लीनिक से तो बेहतर है कि हम सीधे प्राइवेट डॉक्टर के पास चले जाएं। डॉक्टर तो कभी देखने को ही नहीं मिले।"

चौरहटा क्लीनिक तो दोपहर 3 बजे ही ताला बंद मिला। भोलगढ़ स्वास्थ्य केंद्र पर 15 कर्मचारियों के स्टाफ में से सिर्फ एक फार्मासिस्ट और एक संविदा कर्मी नजर आए। करहिया का उपस्वास्थ्य केंद्र तो पूरी तरह ताले के हवाले है। सवाल यह है कि आखिर यह लापरवाही है या सिस्टम की तानाशाही? क्या प्रशासनिक अधिकारियों और स्वास्थ्य विभाग के बीच कोई गठजोड़ है, जो इन नकली क्लीनिकों और कागजी खानापूर्ति को बढ़ावा दे रहा है? जब मीडिया इस मामले को उजागर करता है, तो अधिकारी जवाब देने से बचने लगते हैं। डीपीएम राघवेंद्र मिश्रा का बयान "हम इस संबंध में कोई जवाब नहीं दे सकते, ये मेरा काम नहीं है"- यह साबित करता है कि अधिकारियों में जवाबदेहिता का पूरी तरह अभाव है।

रीवा की जनता आज सवाल पूछ रही है- क्या सरकारी योजनाएं सिर्फ वोट बैंक के लिए हैं? क्या प्रशासन इन नकली क्लीनिकों पर असली कार्रवाई करेगा? या फिर रीवा की जनता को झूठे वादों और खोखली व्यवस्था के भरोसे ही जीना पड़ेगा? यह केवल रीवा की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली का एक और अध्याय है। जब तक जिम्मेदारों को कठोर दंड नहीं दिया जाएगा, तब तक यह खेल जारी रहेगा। समय आ गया है कि सरकार और प्रशासन जनता के स्वास्थ्य के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को गंभीरता से ले और ठोस कार्रवाई करे। वरना, यह व्यवस्था जनविरोध का शिकार होगी और इतिहास इसे कभी माफ नहीं करेगा। जिस देश की स्वास्थ्य व्यवस्था रोगी हो, वहां स्वस्थ भविष्य की कल्पना बेमानी है। रीवा की यह स्थिति केवल एक चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज करना भविष्य के लिए घातक हो सकता है।



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