रीवा में राजनीति, अपराध और माफिया का गठजोड़: "पानी अब सर से ऊपर" Aajtak24 News

रीवा में राजनीति, अपराध और माफिया का गठजोड़: "पानी अब सर से ऊपर" Aajtak24 News

 रीवा/मध्य प्रदेश -रीवा, जो कभी छात्र राजनीति और जनसंघर्ष का केंद्र था, आज अपराध, माफिया और सत्ता के गठजोड़ का गढ़ बन चुका है। पिछले कुछ दशकों में यहाँ की राजनीति में आए बदलावों ने न सिर्फ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, बल्कि जनता के भरोसे को भी हिला दिया है।

संघर्ष से समझौते तक: बदलती हुई राजनीति

1980 से 90 के दशक तक, रीवा में राजनीति का मतलब आदर्शों और जनता के लिए संघर्ष करना था। उस दौर में महाराजा पुष्पराज सिंह और राजेंद्र पांडे जैसे नेताओं ने जनहित को प्राथमिकता दी। लेकिन 2004 के बाद, सत्ता की होड़ में अपराधियों और दबंगों का बोलबाला बढ़ने लगा। राजनीतिक दलों की आय में अचानक बढ़ोतरी हुई, लेकिन क्या इससे आम जनता को कोई लाभ हुआ? लेख के अनुसार, बीस सालों में रीवा में सड़कों और इमारतों का निर्माण तो हुआ, लेकिन ये विकास कार्य भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। कई परियोजनाएँ पूरी होने से पहले ही टूट गईं, और विकास सिर्फ कागज़ों पर सिमट कर रह गया। अवैध उत्खनन पर कोई रोक नहीं लगी और पर्यावरण संरक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गया।

नशा माफिया: रीवा की सबसे बड़ी चुनौती

आज रीवा नशे के कारोबार का एक बड़ा केंद्र बन गया है। शराब, गांजा और भांग के अलावा, मेडिकल नशा, ब्राउन शुगर और स्मैक जैसी ड्रग्स भी गली-गली में बेची जा रही हैं। नशे के इस जाल में युवाओं की एक बड़ी आबादी फंसती जा रही है। लेख के मुताबिक, स्वतंत्रता के बाद पिछले एक दशक में रीवा में नशे का कारोबार इतना बढ़ गया है, जितना पिछले 70 वर्षों में भी नहीं था।

"बरगद" की छत्रछाया में पल रहा माफिया

लेख में एक ऐसी ताकतवर शख्सियत का ज़िक्र है, जिसे लोग "बरगद" कहते हैं। आरोप है कि इसी व्यक्ति के संरक्षण में अवैध प्लांट, भूमि कब्जा, ट्रांसफर उद्योग और नशे का कारोबार फल-फूल रहा है। यह भी कहा गया है कि यह शख्स खुलेआम दरबार लगाकर फैसले करता है, और उसके शिष्य बेखौफ होकर घटनाओं को अंजाम देते हैं। प्रशासन इस सब के बावजूद मूकदर्शक बना हुआ है।

प्रशासन की बेबसी या मिलीभगत?

प्रशासन पर आरोप है कि वह इन अपराधियों पर कार्रवाई करने से बच रहा है। इसका कारण इन "महापुरुषों" का बड़े नेताओं के साथ करीबी संबंध और तस्वीरें हैं। अधिकारियों को अपनी पदस्थापना खोने का डर सताता है, और यही चुप्पी अपराधियों की ताकत बन जाती है। लेख में कहा गया है कि रीवा का प्रशासन आज अपराधियों के आगे बेबस है, और नेताओं से उनकी नज़दीकी उनकी सबसे बड़ी ढाल बन गई है।

जनता की मुख्यमंत्री से गुहार

रीवा की जनता अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से उम्मीद लगाए बैठी है, जिनके पास गृह मंत्रालय भी है और जिनका रीवा से एक भावनात्मक जुड़ाव है। जनता यह सवाल कर रही है कि क्या मुख्यमंत्री तक सही जानकारी पहुँच रही है, और क्या सत्ता के दबाव में आकर प्रशासन आँखें मूँदे बैठा है? लेख में चेतावनी दी गई है कि रीवा में अपराध और राजनीति का यह गठजोड़ अब इतना गहरा हो गया है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। अगर जल्द ही कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में जनआक्रोश को रोक पाना मुश्किल होगा। यह सिर्फ रीवा का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति और प्रशासन की विश्वसनीयता का सवाल है।

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