मंदिर का पैसा सरकारी नहीं, केवल देवता का अधिकार: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, तमिलनाडु सरकार को लगा तगड़ा झटका Aajtak24 News

मंदिर का पैसा सरकारी नहीं, केवल देवता का अधिकार: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, तमिलनाडु सरकार को लगा तगड़ा झटका Aajtak24 News

चेन्नई - मद्रास हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मंदिरों में भक्तों द्वारा दान किया गया धन सरकारी या सार्वजनिक नहीं है, बल्कि उस पर केवल देवता का अधिकार है। इस फैसले के साथ ही, हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को एक बड़ा झटका दिया है और उसके उन पाँच आदेशों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है, जिनके तहत मंदिर के पैसों से व्यावसायिक उद्देश्य के लिए विवाह मंडप बनाने की योजना थी। यह फैसला मंदिरों की संपत्ति के प्रबंधन और उसके दुरुपयोग पर एक निर्णायक टिप्पणी माना जा रहा है, जो पूरे देश में एक मिसाल कायम कर सकता है।

सरकार की दलील खारिज

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने 2023 से 2025 के बीच ऐसे आदेश पारित किए थे, जिनमें मंदिर के धन का उपयोग करके विवाह मंडपों का निर्माण करने की योजना थी। सरकार की दलील थी कि यह कदम हिंदुओं की भलाई के लिए उठाया जा रहा है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने इस योजना को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि राज्य सरकार को मंदिर की संपत्ति का व्यावसायिक उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि इन विवाह मंडपों को किराए पर दिया जाएगा, जिसका कोई धार्मिक उद्देश्य नहीं है।

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रहमण्यम और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की बेंच ने इस मामले की गहन सुनवाई की। सरकार की तरफ से पेश हुए वकील ने तर्क दिया था कि इन भवनों का उपयोग केवल हिंदू विवाह के लिए किया जाएगा, जो एक धार्मिक संस्कार है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि भले ही हिंदू विवाह एक संस्कार हो, लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत इसमें कुछ संविदात्मक तत्व भी शामिल हैं। इसलिए, यह स्वतः ही हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 के तहत एक “धार्मिक उद्देश्य” नहीं बन जाता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु सरकार मंदिर के संसाधनों का उपयोग केवल मंदिरों के रखरखाव, विकास और उससे जुड़ी धार्मिक गतिविधियों पर करने के लिए ही बाध्य है। इसका उपयोग व्यावसायिक रूप से नहीं किया जा सकता, जिससे सरकार के राजस्व में वृद्धि हो।

संपत्ति पर देवता का अधिकार

कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि भक्तों द्वारा मंदिर या देवता को दान की गई चल और अचल संपत्ति पर सिर्फ और सिर्फ देवता का ही अधिकार होता है। यह पैसा हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा उनकी आस्था और आध्यात्मिक लगाव के कारण दिया जाता है। इसे सार्वजनिक या सरकारी पैसा नहीं माना जा सकता। इसका उपयोग केवल मंदिरों में उत्सव मनाने, रखरखाव, विकास, पूजा, अन्नदान, तीर्थयात्रियों के कल्याण और गरीबों की सहायता जैसे धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए ही किया जा सकता है।

अदालत ने अपने आदेश में चेतावनी देते हुए कहा कि यदि मंदिर के धन को स्पष्ट रूप से अनुमति प्राप्त उद्देश्यों से अलग किसी और काम में लगाया जाता है, तो यह दुरुपयोग होगा। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का दुरुपयोग न केवल "मंदिर के संसाधनों का दुरुपयोग" है, बल्कि यह हिंदू श्रद्धालुओं के धार्मिक अधिकारों का भी उल्लंघन है, जिन्होंने अपनी गहरी आस्था और विश्वास के साथ मंदिरों में दान दिया है।

यह फैसला भारत में मंदिरों की संपत्ति के प्रबंधन और उनके संरक्षण को लेकर एक नई दिशा दे सकता है, और यह सुनिश्चित करता है कि दान का पैसा उसी उद्देश्य के लिए उपयोग हो, जिसके लिए वह दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर अनुमति का दायरा बढ़ाने का प्रयास किया जाता है तो फिर इस धन के दुरुपयोग और गबन का रास्ता खुल जाएगा, जो हिंदू धर्म के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। इस फैसले ने उन सभी सरकारी निकायों और अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश दिया है जो धार्मिक संपत्तियों का मनमाना उपयोग करने की कोशिश करते हैं। यह फैसला भविष्य में मंदिरों की स्वायत्तता और उनकी संपत्ति की सुरक्षा के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करेगा।

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