कुण्डलपुर से लगे दो सौ घरों में हथकरघा पहुंचा pahucha Aajtak24 News

 

कुण्डलपुर से लगे दो सौ घरों में हथकरघा पहुंचा pahucha Aajtak24 News 

दमोह - कहने को तो कुण्डलपुर मध्य प्रदेश के दमोह जिले का एक छोटा सा गांव है पर यहां भी अब चंदेरी, महेश्वर और वनारस कि तर्ज पर घर-घर हथकरघा चलाए जाने लगे हैं। यह सब कुछ संभव हो पाया जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की दृष्टि से... दरअसल कुंडलपुर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के अत्यंत प्राचीन मंदिर के लिए विश्व विख्यात है यहां पर भारत के कोने-कोने से यात्री आते हैं। आचार्य श्री के आर्शीवाद से प्रारंभ हुई संस्था श्रमदान में ग्रामीण युवा प्रशिक्षण लेते हैं और थोड़े से अभ्यास के बाद ही ये युवा ₹400-₹500 प्रतिदिन का काम करने में सक्षम हो जाते हैं।  इनमें से कई युवाओं ने अपनी गृहणियों को भी हथकरघा सिखा दिया है। परिणाम यह हुआ कि उनके घर दूसरा निःशुल्क हथकरघा भी आ गया। ऐसे कई पति-पत्नियां हैं जो मिलकर 30-40 हजार रुपए हर माह कमा रहे हैं। वास्तव में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इससे अच्छा मॉडल और नहीं हो सकता। लोगों को अपने गांव में ही रोजगार भी मिल गया, प्रकृति को हानि भी नहीं पहुंची और हमारी बहुमूल्य प्राचीन कला का संरक्षण भी हो गया; इसे कहते हैं "एक पंथ बहु काज" आचार्य श्री के सानिध्य में दिया गया था सौ-वां हथकरघा पिछले महीने छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में विराजमान जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सानिध्य में कुंडलपुर से लगे मढ़िया टिकैत गांव के नवयुवक महेश बर्मन, मोहराई गांव के रामरतन ढीमर, अशोक नगर से लगे कचनार गांव के कपिल सेन एवं गौरव सेन को हथकरघा दिया गया। आचार्य श्री ने इन नवयुवकों को समझाते हुए कहा कि अपने आसपास और जो फालतू युवा घूम रहे हैं उनको भी हथकरघा सिखाओ अपने घर की महिलाओं को भी हथकरघा सिखाओ किंतु ध्यान रखना कि कमाया हुआ धन व्यसनों में ना चला जाए उसका सदुपयोग करना। गुरु मुख से यह शिक्षा सुन यह सभी लोग धन्य हो गए।

कला बहत्तर पुरुष की, ता मैं दो सरदार । 

एक जीव की जीविका, एक जीव उद्धार । 

ये वचन हैं एक जैन संत के और इनका अर्थ भी आसान है कि कहने को तो इंसान के सीखने के लिए बहुत सारी कलाएं हैं पर उनमें दो ही प्रमुख हैं एक जिससे वह रोज़ी-रोटी कमा सके और दूसरी जिससे वह संसार से मुक्त हो सके। वास्तव में देखा जाए तो आज दुनिया भर की सरकारों के समक्ष यह चुनौती है कि हर हाथ को काम कैसे मिले और इसके लिए वह हजारों करोड रुपए खर्च कर कर भी सभी लोगों को आजीविका के योग्य कौशल नहीं सिखा पा रहे हैं। इस गंभीर समस्या का आसान सा समाधान एक जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के द्वारा दिया गया। उन्होंने कुछ उच्च शिक्षित युवाओं को प्रेरणा दी कि ग्रामीण इलाकों में वसी युवा पीढ़ी को हाथ से कपड़ा बनाने की कला सिखाई जाए। इससे उन्हें अपने घर में ही खेती के साथ एक रोजगार मिल जाएगी। उनकी रोजगार को सुनिश्चित करने के लिए श्रमदान नामक एक संस्था की स्थापना की गई। इस संस्था में ग्रामीण युवक प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं और कुछ ही महीनों में वे वस्त्र निर्माण कि विविध कलाओं में निपुण हो जाते हैं। और उन्हें घर पर कपड़ा बुनाई करने के लिए एक हथकरघा दे दिया जाता है, वो भी नि:शुल्क एक बार आकर अवश्य इस पावन कार्य को देखें क्योंकि 150 करोड़ की आबादी वाले और 6 लाख गांवों वाले हमारे इस भारत की सारी समस्याओं का हल आखिरकार कुटीर उद्योग से ही निकल कर आएगा जिससे किसी ग्रामवासी को रोजी रोटी के लिए शहरों में संघर्ष नहीं करना पड़ेगा और हमारा देश पुनः सोने की चिड़िया बन जायेगा स्मार्ट सिटी तो हमने बना लीं अब बारी है।


Handloom reached two hundred houses adjacent to Kundalpur

Damoh - Kundalpur is a small village in Damoh district of Madhya Pradesh, but here too, handlooms have started being run in every house on the lines of Chanderi, Maheshwar and Vanaras. All this became possible due to the vision of Jain saint Acharya Shri Vidyasagar Ji Maharaj... Actually, Kundalpur is world famous for the very ancient temple of Lord Adinath, the first Tirthankar of Jainism, here travelers come from every corner of India. Rural youth take training in Shramdaan, an organization started with the blessings of Acharya Shri and after a little practice, these youth become capable of doing work worth ₹ 400-₹ 500 per day. Many of these youth have also taught handloom to their housewives. The result was that a second free handloom also arrived at his home. There are many husbands and wives who together are earning Rs 30-40 thousand every month. In fact, there cannot be a better model than this for the rural economy. People got employment in their own villages, nature was not harmed and our precious ancient art was also preserved; This is called "one sect multi hinge"


The hundredth handloom was given under the guidance of Acharya Shri


Last month, under the guidance of Acharya Shri Vidyasagar Ji Maharaj, the Jain saint present in Dongargarh, Chhattisgarh, young men Mahesh Burman of Madhiya Tikait village adjacent to Kundalpur, Ramratan Dhimar of Mohrai village, Kapil Sen and Gaurav Sen of Kachnar village adjacent to Ashok Nagar were given handlooms. . While explaining to these youth, Acharya Shri said that teach handloom to the idle youth around you and also teach handloom to the women of your house but keep in mind that the money earned should not be wasted in addictions and it should be utilized well. All these people became blessed after hearing this teaching from the Guru.

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