उच्च भाव ही भवों की भ्रमणा मिटाने में सहायक: मुनि पीयूषचन्द्रविजय | Uchch bhav hi bhavo ki bhraman mitane main sahayak

उच्च भाव ही भवों की भ्रमणा मिटाने में सहायक: मुनि पीयूषचन्द्रविजय

उच्च भाव ही भवों की भ्रमणा मिटाने में सहायक: मुनि पीयूषचन्द्रविजय

राजगढ़/धार (संतोष जैन) - 45 आगमों के अंतर्गत उत्तराध्ययन सूत्र पर हमारे यहां प्रवचन की श्रृंखला चल रही है । इस सूत्र की प्रथम गाथा में बताया गया है कि बुद्धि का फल क्या ? सामान्य भाषा में लोग बुद्धि का तात्पर्य सुबुद्धि और कुबुद्धि के रुप में लेते है पर शास्त्रों की भाषा में बुद्धि चार प्रकार की होती है- औत्पातिकी बुद्धि, वैनेयिकी बुद्धि, कार्मिकी बुद्धि और पारिणामिकी बुद्धि । श्रेणिक महाराजा के राज्य में अभयकुमार मंत्री शास्त्रोक्त इन चारों बुद्धियों के धारक और औत्पातिकी बुद्धि की वजह से किसी भी समस्या का त्वरित निराकरण करने में सक्षम थे । चेलना महारानी ने अपने धर्म प्रभाव के कारण श्रेणिक महाराजा का जीवन विनाश से विकास की ओर मोड़ दिया था । माता-पिता की चिन्ता को देखकर यदि पुत्र की आंखों में आंसू आ जाये तो वह पुत्र मातृ-पितृ भक्त होकर श्रवणकुमार जैसा होता है । जन्म के साथ जो माता अपनी संतान को अच्छे संस्कार देती है वही मॉं के रुप में मानी जाती है । ज्यादा सोचने वाला व्यक्ति डिप्रेशन में आ जाता है । हम प्रवचन में अपने कर्मो के बोझ को हलका करने के लिये आते है । जैन दर्शन सिर्फ आत्मा की बात ही नहीं करता है बल्कि आत्मा के सर्वांगीण विकास की बात करता है । घर की तिजोरी की चाबी परिवार में योग्य पुत्र को ही सुपुर्द की जाती है । उक्त बात श्री राजेन्द्र भवन राजगढ़ में गच्छाधिपति आचार्य देवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्यरत्न मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा. ने कही । आपने कहा कि धन्यकुमार और शालीभद्रजी अपने पूर्व जन्म के किये गये दान के प्रभाव से ही महान बने । हम दूसरों को धोखा दे सकते है पर स्वयं की आत्मा को कभी धोखा नहीं दिया जा सकता । धर्म आत्मा को चिन्ता से मुक्त करता है और प्रवचन में आत्मा का ही चिन्तन किया जाता है । तीर्थंकरों के समवशरण की रचना देवों द्वारा की जाती है । भावों का बड़ा महत्व होता है, द्रव्य तो गौण होता है । जीवन में सावधानी रखना बहुत जरुरी है हमेशा उच्चभाव रखना चाहिये जिससे जीव के भवों की भ्रमणा समाप्त होती है ।

उच्च भाव ही भवों की भ्रमणा मिटाने में सहायक: मुनि पीयूषचन्द्रविजय

नमस्कार महामंत्र की आराधना हेतु सकल जैन श्रीसंघ राजगढ़ की विनती पर मुनिश्री ने अपनी सहमति प्रदान करते हुये कहा कि 14 अगस्त से 22 अगस्त तक यह आराधना राजगढ़ श्रीसंघ में करवायी जावेगी । 2 अगस्त से 4 अगस्त तक अट्ठम तप आराधना का आयोजन श्री मथुरालालजी प्यारचंदजी मोदी परिवार की ओर से रखा गया है ।


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