व्यक्ति तप से कर्म की निर्जरा करता है - पूज्य धर्मेंद्र मुनि जी महाराज साहब
मेघनगर (अली असगर बोहरा) - व्यक्ति तप से कर्म की निर्जरा करता है, जीव एक भव से ,दूसरे भव ,तीसरे भव, में जाता है। उसे पिछले भव की बातें याद नहीं रहती है, परंतु सारी बातें, यादें उसके दिमाग में नहीं आत्मा में सुरक्षित रहती है ,आत्मज्ञान दर्शन से युक्त है तथा आत्मा ही ज्ञाता है ,आत्मा में कम कर्म का आवरण है, जीव जीव है अजीव अजीव है मोह कर्म के कारण जीव दुःख को भी सुख मानता है, जीव को सुख दुख आए तो सम भाव रखना चाहिए ,जीव को कर्म के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए ,कर्म वाद के सिद्धांत को पढ़ने समझने से जीवन में परिवर्तन आता है ,व्यक्ति मोह कर्म के छमोछच्यं से सामायिक सप्त व्यसन का त्याग करता है, महापुरुष नरक का वर्णन लोगों को डराने के लिए तथा स्वर्ग का वर्णन व्यक्ति को प्रसन्न करने के लिए बताते हैं, ताकि व्यक्ति प्रेरणा ले, आत्मा के साथ कर्म है तथा कर्म ही फल देते हैं कर्म ही सुख दुख देते हैं, कर्म के उदय से होने वाले सुख दुख हमेशा नहीं रहते हैं ।
पूज्य सुभेश मुनि जी महाराज साहब ने कहा व्यक्ति की इच्छाए संसार में पूरी नहीं होती है ,संसार के कार्य भी कभी पूरे नहीं होते हैं जीव को अपनी इच्छा है सीमित करना चाहिए संसार असार है दुखमय है ऐसा चिंतन करना चाहिए, संसार नाग के समान है जिस ने छुआ उसे डंक भी लगता है जो कार्य इच्छाए सुख देने वाली है, बाद में वही दुख का कारण बनती है ,संसार संसार की भौतिक वस्तुएं दुख देने वाली है ,इनके दुष्परिणाम बताने पर जो धीरे-धीरे इन्हें छोड़ देता है ,आज पूज्य श्री अतिशय मुनि जी महाराज साहब एवं पूज्य गिरीश मुनि जी महाराज साहब का मंगल प्रवेश हुआ एवं उक्त जानकारी पुर्वेश कटारिया ने दी ।
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