बीता हुआ समय और शरीर से निकले प्राण कभी वापस नहीं लौटते - प्रन्यास प्रवर जिनेन्द्र विजयजी | Bita hua samay or sharir se niklepran kabhi wapas nhi lotte

बीता हुआ समय और शरीर से निकले प्राण कभी वापस नहीं लौटते - प्रन्यास प्रवर जिनेन्द्र विजयजी

बीता हुआ समय और शरीर से निकले प्राण कभी वापस नहीं लौटते - प्रन्यास प्रवर जिनेन्द्र विजयजी

अष्ट प्रभावक ने अपने गुरू देवेन्द्र विजय के शिष्य की मांगलिक श्रवण करवाई 

झाबुआ (मनीष कुमट) - स्थानीय श्री ़ऋषभदेव बावन जिनालय स्थित पोषध शाला भवन में 25 सितंबर, बुधवार सुबह समाजजनों को प्रवचन देते हुए बताया कि जीवन में पांच चीजे वापस कभी लौट कर नहीं आती है। एक संत का वचन, दूसरा नदी का प्रवाह, तीसरा समय, चैथा तीर और पांचवा गए हुए प्राण, यह बात प्रन्यास प्रवर ने भद्रबाहु स्वामीजी का प्रसंग सुनाते हुए कहीं। 

जिनेन्द्र विजयजी ने आगे कहा कि बचपन में राहुल की परिकल्पना के रूप में कथा यह थी कि बिना पंखों के विचार सब रीते है, हाय यह मनुष्य पक्षियों से भी गए बीते है, अर्थात पशु की योनि में जो कार्य कर सकते है, उससे बढ़कर मनुष्य जीवन में करना, यह पुण्य का कार्य है। प्रन्यास प्रवर ने बताया कि श्री संघ के निवेदन पर नेपाल में रहे हुए महाप्राण ध्यान करते हुए भद्रबाहु स्वामीजी ने जब 500 षिष्यों सहित स्थूल भ्रद को पढ़ाया और जब ज्ञान का अहंकार उनके जीवन में आया तो उन्होंने अर्थ पढ़ाना बंद कर दिया। श्रीयक की सात बहनों द्वारा जब श्रीयक को तप की महिमा समझाई ओैर तप के अभाव में वे देवलोक गए और इधर यक्षा ने सीमंधर स्वामीजी के पास जाकर दो चूलीका लाकर संघ को अर्पण की, इसका पूरा वृतांत बताया। 

रविन्द्र सूरीजी देवेन्द्र विजयजी के षिष्य थे

बुधवार को आचार्य भगवंत नरेन्द्र सूरीजी ने श्रीमद् विजय रविन्द्र सूरीष्वरजी की महामांगलिक सुनाते हुए बताया कि आप देवेन्द्र विजयजी मसा के षिष्य थे। प्रकृति प्रेम उनका परम स्वभाव था। अष्ट प्रभावक की सूरी मंत्र की साधना निरंतर चल रहीं है। बुधवार को धर्मसभा में विषेष रूप मुंबई (महराष्ट्र) से अष्ट प्रभावक एवं प्रन्यास प्रवर के दर्षन-वंदन हेतु भक्तजन पधारे।

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