किसान अन्नदाता हैं, किन्तु चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी स्तिथि बुरी है - ब्रम्हे

किसान अन्नदाता हैं, किन्तु चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी स्तिथि बुरी है - ब्रम्हे

किसान अन्नदाता हैं, किन्तु चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी स्तिथि बुरी है - ब्रम्हे

सरकार फसल बीमा और समर्थन मूल्य बढ़ाकर बीज,खाद निशुल्क प्रदाय करे 

बालाघाट (टोपराम पटले) - किसानों को लॉलीपॉप देकर कोई भी राजनैतिक पार्टी केंद्र या राज्य में अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो जाता है। किन्तु सरकार बनने से पहले या सरकार बनने के बाद कभी किसानों की स्तिथि का जायजा लेने कभी कोई सरकार का नुमाइंदा उस किसान के घर तक या उसके खेतों तक पहुंच कर आकलन किया है कि जिसे हम अपना अन्नदाता कहते हैं उसकी मेहनत या लागत के अनुसार उसे उसके अनाज का सहीं मूल्य मिल रहा है कि नही? आज इस महगाई के समय जो किसान हमें और हमारे परिवार को भोजन उपलब्ध कराने के लिए रात और दिन मेहनत करता है। आज शासकीय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी बुरी है। क्या सरकार को हमारे इन अन्नदाताओं किसानों की स्तिथि को सुधारने के लिए या फिर कम से कम शासकीय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के समकक्ष लाने की दिशा में कोई ठोस कदम नही उठाना चाहिए? यदि सरकार चाहे तो आज हमारे किसानों की स्तिथि एक सरकारी कर्मचारी जैसी हो सकती है। लेकिन सरकार को किसानों के हित मे कोई ठोस निर्णय लेने की आवश्कयता है। यह उदगार मिशन न्यू इंडिया नरेंद्र मोदी विचार मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सूरज ब्रम्हे ने सरकार से मांग की है कि हमारे अन्नदाता किसान भाइयों की स्तिथि को सुधारने के उनके फसलों का फसल बीमा बढ़ाया जाये साथ ही उनके फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाकर किसानों को निशुल्क बीज खाद सोसायटी से उपलब्ध कराई जाए।

श्री ब्रम्हे ने कहा कि देश की आजादी को 70 वर्ष से भी ऊपर हो गए हैं। इस बीच कई सरकारें आईं और चली भी गई किन्तु आज भी हमारा अन्नदाता किसान अपनी स्तिथि पर अंशु बहाकर हमारे और आपके लिए भोजन जुटाने में रात और दिन लगा हुआ है। जब- जब भी चुनाव आता है राजनीतिक पार्टियाँ अपने घोषणा पत्र या वचन पत्र छपवाकर किसानों के हित मे लम्बे-चौड़े वादे करके किसानों को अपने पक्ष में करके चुनाव जीत जाता है। चुनाव जीतने के बाद उन पार्टियों के सभी वादे खोखले साबित होतें हैं। जबकि किसानों की मेहनत और लागत को देखा जाये तो एक एकड़ की खेती करने में उस किसान को 10 से बारह हजार रुपियों का खर्च आता है। वह किसान उस जमीन को श्रद्धा और विश्वास के साथ देखते हुवे नुकसान की परवाह किये बिना कर्ज लेकर या जेवर बेचकर खेती करता है। किन्तु कभी प्रकृति की मार तो कभी भ्रष्ट नेताओं का कहर झेलकर भी मौन रहता है। सरकार किसानों की मेहनत और लागत को देखते फसल का समर्थन मूल्य बढ़ाकर फसल बीमा की राशी में बढ़ोतरी करते हुवे उन्हें बीज खाद सोसाइटियों से निशुल्क करना चाहिए। तभी किसानों की स्तिथि सामान्य हो पायेगीं। और किसान अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन जी पायेगें।

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