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| नशे के खिलाफ कार्रवाई तेज, लेकिन अदालत में कितने मामले टिक रहे? रीवा-मऊगंज में विवेचना पर सवाल |
रीवा। नशे के अवैध कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए शासन और पुलिस स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान नशीली सिरप, प्रतिबंधित टैबलेट, गांजा और अन्य मादक पदार्थों की बरामदगी के साथ आरोपियों के विरुद्ध प्रकरण भी दर्ज किए जा रहे हैं। लेकिन रीवा और मऊगंज में अब एक अहम सवाल चर्चा में है कि पुलिस की कार्रवाई के बाद न्यायालय में इन मामलों की स्थिति क्या रहती है? कितने प्रकरणों में आरोप सिद्ध हो पाते हैं और कितने मामलों में आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी होना पड़ता है?
किसी भी आपराधिक मामले में केवल गिरफ्तारी और जब्ती ही पर्याप्त नहीं होती। अपराध साबित करने के लिए मजबूत विवेचना, घटनास्थल से जुटाए गए भौतिक एवं वैज्ञानिक साक्ष्य, जब्ती प्रक्रिया का नियमानुसार पालन, गवाहों के बयान और न्यायालय में प्रभावी पैरवी जरूरी होती है। यदि जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य एकत्र नहीं किए जाते या अभियोजन पक्ष उन्हें न्यायालय के सामने सही तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पाता, तो मामला कमजोर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में आरोपी को संदेह का लाभ मिलना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
गवाहों के बयान बदलने का मुद्दा भी अहम
नशे से जुड़े मामलों में गवाहों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। स्थानीय स्तर पर ऐसी शिकायतें और चिंताएं सामने आती रही हैं कि कुछ गवाह पुलिस के सामने बयान देने के बाद न्यायालय में अपने पूर्व कथनों से मुकर जाते हैं। इससे अभियोजन पक्ष का मामला प्रभावित हो सकता है। ऐसे मामलों में यह जांचना जरूरी है कि गवाह ने स्वेच्छा से बयान बदला या उस पर किसी प्रकार का दबाव, भय अथवा प्रलोभन था।
हालांकि, हर बार बयान बदलने वाले गवाह को झूठा गवाह मान लेना उचित नहीं है। यदि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर झूठी गवाही दी है या न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। इसके लिए तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच जरूरी है।
विवेचना में कमी पर किसकी होगी जवाबदेही?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल विवेचना की गुणवत्ता और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी को लेकर है। यदि किसी मामले में जब्ती प्रक्रिया में गंभीर खामी रही हो, आवश्यक साक्ष्य एकत्र नहीं किए गए हों या जांच में ऐसी लापरवाही हुई हो जिसके कारण अभियोजन पक्ष आरोप साबित न कर सके, तो संबंधित विवेचक की भूमिका की समीक्षा होनी चाहिए।
इसी तरह थाना प्रभारी और वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी उनकी वास्तविक भूमिका और पर्यवेक्षण के आधार पर तय की जानी चाहिए। न्यायालय से आरोपी के बरी होने के बाद प्रत्येक मामले में यह देखना उपयोगी होगा कि बरी होने का कारण साक्ष्य का अभाव था, गवाहों का मुकरना था, कानूनी प्रक्रिया में कमी थी या विवेचना में कोई गंभीर त्रुटि रह गई थी। यदि समीक्षा में लापरवाही प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।
कार्रवाई के आंकड़ों के साथ परिणाम भी हों सार्वजनिक
नशे के विरुद्ध अभियान की सफलता का आकलन केवल दर्ज प्रकरणों, गिरफ्तार आरोपियों और जब्त मादक पदार्थों की मात्रा से नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि कितने मामलों में आरोप पत्र प्रस्तुत हुए, कितने प्रकरणों में दोषसिद्धि हुई और कितने मामलों में आरोपी बरी हुए। साथ ही, बरी होने के कारणों का वर्गीकरण कर कमियों को दूर करने की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
रीवा और मऊगंज में पुलिस, अभियोजन विभाग और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय से नशे के मामलों की जांच और न्यायालयीन पैरवी को मजबूत किया जा सकता है। गंभीर मामलों में समय पर साक्ष्य संकलन, गवाहों की सुरक्षा, वैज्ञानिक जांच और अभियोजन से समन्वय पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
अब सवाल यह है कि क्या संबंधित विभाग नशे के विरुद्ध कार्रवाई के साथ न्यायालयीन परिणामों की भी नियमित समीक्षा करेंगे? यदि कमजोर विवेचना या लापरवाही सामने आती है तो जवाबदेही तय करना जरूरी है। नशे के कारोबार पर प्रभावी अंकुश के लिए कार्रवाई के साथ मजबूत साक्ष्य, निष्पक्ष जांच और कानून के अनुरूप प्रभावी पैरवी भी उतनी ही आवश्यक है।
