रीवा-मऊगंज की गौशालाओं पर सवाल, करोड़ों के खर्च के बावजूद गोवंश की सुरक्षा चुनौती

रीवा-मऊगंज की गौशालाओं पर सवाल, करोड़ों के खर्च के बावजूद गोवंश की सुरक्षा चुनौती

रीवा। रीवा एवं नवीन जिला मऊगंज में गौशालाओं की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं। गोवंश संरक्षण के लिए सरकारी योजनाएं संचालित होने और गौशालाओं के संचालन पर राशि खर्च किए जाने के बावजूद यदि गायों को पर्याप्त चारा-पानी, सुरक्षित आश्रय और समय पर उपचार नहीं मिल रहा है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से गौशालाओं की स्थिति को लेकर शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। इन शिकायतों के बीच प्रशासनिक निगरानी, सरकारी धन के उपयोग और गोवंश की सुरक्षा को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है।

सोशल मीडिया पर गौशालाओं की स्थिति से संबंधित तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से भी सवाल उठाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित विभागों का पक्ष सामने आना आवश्यक है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

करोड़ों का खर्च, फिर भी व्यवस्था पर सवाल

गोवंश संरक्षण और गौशालाओं के संचालन के लिए सरकार की ओर से विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सहायता उपलब्ध कराई जाती है। ऐसे में रीवा और मऊगंज जिले की गौशालाओं को स्वीकृत बजट, जारी राशि, वास्तविक खर्च और वहां मौजूद गोवंश की संख्या का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

यदि गौशालाओं के संचालन पर राशि खर्च हो रही है, तो उसका लाभ पशुओं तक पहुंचना भी जरूरी है। प्रत्येक गौशाला में पर्याप्त चारा, स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई, सुरक्षित शेड और बीमार पशुओं के उपचार की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि कहीं इन सुविधाओं की कमी है, तो उसके कारणों की जांच कर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

सड़कों पर बेसहारा गोवंश, दुर्घटनाओं का खतरा

रीवा-मऊगंज के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सड़कों पर घूमते गोवंश की समस्या भी चिंता का विषय है। सड़क पर बैठे मवेशियों के कारण वाहन चालकों को परेशानी होती है और दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। वाहनों की चपेट में आने से पशुओं के घायल होने या उनकी मौत होने की आशंका भी बनी रहती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि गोवंश संरक्षण के लिए गौशालाएं संचालित की जा रही हैं, तो सड़कों पर घूमने वाले पशुओं के सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? क्या गौशालाओं में पर्याप्त क्षमता उपलब्ध है? क्या स्थानीय निकायों और पंचायतों के माध्यम से बेसहारा गोवंश को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की व्यवस्था नियमित रूप से की जा रही है? इन बिंदुओं पर प्रशासन को तथ्यात्मक समीक्षा करनी चाहिए।

निरीक्षण और सरकारी खर्च का हिसाब हो सार्वजनिक

गौशालाओं की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए जिला प्रशासन को जिलेवार और गौशालावार निरीक्षण कराना चाहिए। निरीक्षण के दौरान पशुओं की संख्या, चारे-पानी की उपलब्धता, कर्मचारियों की उपस्थिति, पशु चिकित्सकीय सुविधाओं और रखरखाव पर हुए खर्च की जांच की जानी चाहिए।

इसके साथ ही रिकॉर्ड में दर्ज गोवंश और मौके पर मौजूद पशुओं की संख्या का मिलान भी जरूरी है। चारे की खरीद, उसके वितरण और पशुओं की मृत्यु से संबंधित अभिलेखों की समीक्षा की जाए, ताकि किसी भी तरह की अनियमितता या लापरवाही सामने आने पर उचित कार्रवाई की जा सके।

यदि जांच में आर्थिक अनियमितता, पशुओं की उपेक्षा या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, बेहतर काम करने वाली गौशालाओं की व्यवस्थाओं को भी सामने लाया जाना चाहिए, ताकि अन्य स्थानों पर भी अच्छी कार्यप्रणाली अपनाई जा सके।

गोसेवा केवल दावों से नहीं, व्यवस्था से साबित होगी

गोवंश संरक्षण भारतीय समाज की आस्था और परंपरा से जुड़ा विषय है। सार्वजनिक मंचों पर गोसेवा की बात करना जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक जरूरी है कि गौशालाओं में पशुओं को भोजन, पानी, आश्रय और उपचार मिले।

सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, गौशाला संचालकों और सामाजिक संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संरक्षण के नाम पर संचालित योजनाओं का वास्तविक लाभ गोवंश तक पहुंचे। यदि शिकायतें सामने आती हैं, तो उन्हें नजरअंदाज करने के बजाय मौके पर जांच कर आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए।

प्रशासन से जवाबदेही तय करने की मांग

रीवा और मऊगंज में गौशालाओं की व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के बीच जिला प्रशासन से पारदर्शी कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है। गौशालाओं का नियमित निरीक्षण, सरकारी राशि के उपयोग का विवरण और गोवंश की देखभाल से संबंधित जानकारी सार्वजनिक होने से व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ सकती है।

सड़कों पर घूमने वाले गोवंश के प्रबंधन के लिए स्थानीय निकायों, ग्राम पंचायतों और संबंधित विभागों के बीच समन्वय भी आवश्यक है। घायल पशुओं के उपचार, दुर्घटनाओं की रोकथाम और मृत पशुओं के उचित निस्तारण की व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।

निष्कर्षतः, गोवंश संरक्षण केवल योजनाओं, बजट और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि गौशालाओं में पशुओं को कितनी बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं और सरकारी संसाधनों का उपयोग कितनी पारदर्शिता से किया जा रहा है। रीवा-मऊगंज में सामने आ रही शिकायतों की निष्पक्ष जांच और नियमित निगरानी से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी तथा गोवंश की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।

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