रीवा-मऊगंज की 148 सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली पर सवाल, जांच की मांग

रीवा-मऊगंज की 148 सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली पर सवाल, जांच की मांग

रीवा/मऊगंज। रीवा और मऊगंज जिलों में संचालित 148 सेवा सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए गए हैं। समितियों में प्रशासकों की व्यवस्था, निर्वाचित प्रबंधन की स्थिति, धान-गेहूं खरीदी के खर्च, कमीशन, पल्लेदारी और मजदूरी भुगतान से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की जा रही है।

सहकारी समितियां किसानों को ऋण उपलब्ध कराने, कृषि उपज की खरीदी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में इनके वित्तीय लेन-देन और प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है।

उपलब्ध विवरण में आरोप लगाया गया है कि कुछ समितियों में किसानों से प्रति बोरी पांच रुपये तक पल्लेदारी के नाम पर लिए जाने और खरीदी से जुड़े कार्यों में प्रति क्विंटल लगभग 30 रुपये के कथित भुगतान की जांच होनी चाहिए। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए स्वीकृत दरों, भुगतान रजिस्टर, बैंक खातों और संबंधित बिलों का सत्यापन आवश्यक है।

प्रशासकों की नियुक्ति और जिम्मेदारियों पर भी सवाल

समितियों में लंबे समय से निर्वाचित प्रबंधन की स्थिति, प्रशासकों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। मांग की गई है कि नियुक्ति आदेशों, वैधानिक प्रावधानों और प्रत्येक प्रशासक के अधीन संचालित समितियों की संख्या की समीक्षा की जाए। यह भी जांच हो कि प्रशासनिक व्यवस्था का किसानों के कामकाज और भुगतान पर कोई प्रभाव पड़ रहा है या नहीं।

ऑडिट और भुगतान रिकॉर्ड की हो जांच

खरीदी केंद्रों पर हम्माली, तुलाई, परिवहन और मजदूरी के नाम पर किए गए भुगतान का वास्तविक कार्य और निर्धारित दरों से मिलान कराने की मांग की गई है। इसके अलावा समितियों की आय-व्यय रिपोर्ट, ऋण वितरण एवं वसूली, बकाया राशि और ऑडिट आपत्तियों की स्थिति की भी समीक्षा जरूरी बताई गई है।

मांग है कि संभागीय आयुक्त, रीवा एवं मऊगंज के कलेक्टर और सहकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारी सभी 148 समितियों की समितिवार जांच कराएं। जहां दस्तावेजों से अनियमितता प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाए। वहीं, संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और समिति प्रबंधन को अपना पक्ष रखने का अवसर भी मिले।

फिलहाल, प्रस्तुत आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और संबंधित विभाग का पक्ष सामने आना बाकी है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि समितियों में किन स्तरों पर प्रक्रियागत कमियां हैं और क्या किसी मामले में वित्तीय अनियमितता हुई है।

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