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| संविधान सर्वोपरि या आस्था के नाम पर नियमों की अनदेखी? रीवा-मऊगंज में उठे सवाल |
रीवा/मऊगंज। धार्मिक आस्था का सम्मान और कानून का पालन—दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। लेकिन जब धार्मिक आयोजनों के दौरान सार्वजनिक मार्गों, चौराहों और शासकीय संस्थानों के आसपास ध्वनि, यातायात या सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं की शिकायतें सामने आती हैं, तो प्रशासन की जिम्मेदारी और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं।
रीवा और मऊगंज में नवरात्रि एवं दुर्गा उत्सव के बीच धार्मिक आयोजनों की व्यवस्थाओं को लेकर यह मांग उठ रही है कि ध्वनि विस्तारक यंत्रों के इस्तेमाल, मोटरसाइकिल रैलियों, सार्वजनिक मार्गों पर प्रतिमा स्थापना और यातायात प्रबंधन से संबंधित नियमों का पालन सभी आयोजनों में समान रूप से सुनिश्चित किया जाए।
आस्था के साथ नागरिक सुविधाओं का ध्यान जरूरी
धार्मिक आयोजन सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। संविधान भी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और अन्य संवैधानिक सीमाओं के अधीन है। ऐसे में किसी आयोजन से आम लोगों का आवागमन बाधित होने, अस्पताल पहुंचने में परेशानी होने या निर्धारित ध्वनि नियमों का उल्लंघन होने की शिकायत पर प्रशासन को तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए।
सभी आयोजनों पर समान मापदंड लागू हों
मुख्य सवाल यह है कि क्या नियमों का पालन सभी धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक आयोजनों में समान रूप से कराया जाता है? नागरिकों की मांग है कि कार्रवाई किसी व्यक्ति या संगठन की पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि उल्लंघन की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हो। सार्वजनिक स्थलों के इस्तेमाल और आयोजनों की अनुमति से संबंधित नियमों की जानकारी भी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
प्रशासन की जवाबदेही पर नजर
जिला प्रशासन और पुलिस से अपेक्षा है कि वे आयोजनों से पहले यातायात, ध्वनि नियंत्रण और सुरक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित करें। नियमों के उल्लंघन की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो और जहां आरोप प्रमाणित न हों, वहां स्थिति भी स्पष्ट की जाए। इससे धार्मिक आयोजनों की गरिमा बनाए रखने के साथ आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सकेगी।
संविधान और कानून सभी के लिए समान
संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का प्रावधान करता है, जबकि अनुच्छेद 25 सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य सहित निर्धारित सीमाओं के अधीन धार्मिक स्वतंत्रता देता है। इसलिए धार्मिक आस्था और कानून के पालन को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
रीवा और मऊगंज में अब निगाह प्रशासन की कार्यप्रणाली पर है। निष्पक्ष जांच, स्पष्ट दिशा-निर्देश और नियमों का समान पालन ही यह भरोसा मजबूत कर सकता है कि सार्वजनिक व्यवस्था के मामले में किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा रहा है।
