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| सरकारी जमीन कहां गई? रीवा-मऊगंज में पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा खसरों की जांच की मांग |
रीवा/मऊगंज। रीवा और नवीन जिला मऊगंज में शासकीय एवं विभिन्न सरकारी संस्थाओं के नाम दर्ज जमीनों के रकबे, सीमांकन और राजस्व रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि कुछ स्थानों पर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण तथा पुराने और वर्तमान राजस्व अभिलेखों में अंतर की शिकायतें सामने आई हैं। ऐसे में शासकीय जमीनों का रिकॉर्ड दुरुस्त कराने और मौके पर भौतिक सत्यापन कराने की मांग की जा रही है।
शिक्षा, वन, पुलिस, लोक निर्माण, सहकारिता और स्वास्थ्य विभाग सहित विभिन्न संस्थाओं के नाम दर्ज जमीनों के अलावा श्मशान, धार्मिक स्थलों, गौशालाओं और सड़क निर्माण के लिए आरक्षित भूमि की स्थिति की जांच कराने की आवश्यकता बताई जा रही है। हालांकि, इन मामलों में कथित अनियमितताओं की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।
पुराने रिकॉर्ड और कंप्यूटरीकृत खसरों का हो मिलान
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पुराने बंदोबस्त अभिलेखों, नक्शों, खसरों और वर्तमान कंप्यूटरीकृत रिकॉर्ड का मिलान कराया जाना चाहिए। इससे पता चल सकेगा कि संबंधित भूमि का मूल रकबा कितना था, वर्तमान रिकॉर्ड में कितना दर्ज है और मौके पर वास्तविक स्थिति क्या है।
सवाल यह भी है कि सरकारी जमीनों की नियमित निगरानी और सीमांकन की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों ने समय-समय पर अभिलेखों का सत्यापन कराया या नहीं। यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर मिलता है, तो उसके कारणों की जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
गढ़ क्षेत्र के स्कूल की जमीन का मामला
उपलब्ध विवरण के अनुसार, ग्राम गढ़ में प्राथमिक पाठशाला से संबंधित खसरा नंबर 146 तथा खसरा नंबर 51/2 और 52/9 से जुड़े भूमि रिकॉर्ड और रकबे को लेकर विवाद की बात सामने आई है। प्राथमिक एवं कन्या माध्यमिक विद्यालय की जमीन के रकबे में बदलाव होने का दावा किया गया है। बताया गया है कि संबंधित मामला राजस्व न्यायालय मनगवां और विभागीय अधिकारियों के समक्ष विचाराधीन है।
इस मामले में विद्यालयों के नाम दर्ज भूमि, पुराने अभिलेखों, वर्तमान खसरे और मौके पर उपलब्ध जमीन का आधिकारिक मिलान कराया जाना आवश्यक है। न्यायालय में विचाराधीन प्रकरण के अंतिम निष्कर्ष सामने आने से पहले किसी भी पक्ष को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
आयुर्वेद औषधालय की जमीन पर भी उठे सवाल
खसरा नंबर 52/9 से संबंधित भूमि को आयुर्वेद औषधालय के लिए दान में दिए जाने का दावा किया गया है। इस जमीन पर अतिक्रमण और रास्ते को लेकर विवाद की शिकायतें भी बताई जा रही हैं। मांग की गई है कि दानपत्र, भूमि हस्तांतरण संबंधी दस्तावेज, राजस्व नक्शे और वर्तमान कब्जे की स्थिति का परीक्षण कराया जाए।
इसी तरह पशु औषधालय, थाना और अन्य शासकीय संस्थाओं की जमीनों का भी सीमांकन कराकर यह स्पष्ट किया जाए कि मौके पर मौजूद निर्माण वैध हैं या नहीं।
सड़क की सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की आशंका
सड़क निर्माण, चौड़ीकरण और भविष्य में विस्तार के लिए सुरक्षित भूमि का संरक्षण भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। स्थानीय लोगों की मांग है कि राष्ट्रीय राजमार्ग, प्रादेशिक मार्ग और ग्रामीण सड़कों से संबंधित राजस्व रिकॉर्ड की जांच कराई जाए। जहां आवश्यक हो, वहां सीमांकन कर सीमा चिह्न लगाए जाएं, ताकि सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर नए अतिक्रमण को रोका जा सके।
1950 से अब तक के रिकॉर्ड का ऑडिट कराने की मांग
रीवा और मऊगंज की सभी तहसीलों में वर्ष 1950 से वर्तमान तक शासकीय एवं संस्थागत भूमि के रिकॉर्ड में हुए बदलावों की समीक्षा कराने की मांग उठाई गई है। इसके अंतर्गत मूल रकबे, विभागों को हुए आवंटन, नामांतरण, भूमि के उपयोग में बदलाव और वर्तमान दर्ज रकबे की जानकारी जुटाने का सुझाव दिया गया है।
आयुक्त और कलेक्टर से जांच की अपेक्षा
स्थानीय नागरिकों की मांग है कि संभागीय आयुक्त तथा रीवा और मऊगंज के जिला कलेक्टर तहसीलवार विशेष सर्वे कराएं। पुराने नक्शों, बंदोबस्त अभिलेखों और वर्तमान खसरों का मिलान करने के साथ संबंधित विभागों से उनकी भूमि का विवरण प्राप्त किया जाए।
जांच में जहां अतिक्रमण या अभिलेखों में अनियमितता प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाए। वहीं, न्यायालय में विचाराधीन मामलों में संबंधित आदेशों और कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए।
सरकारी जमीनों का संरक्षण केवल राजस्व विभाग की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के भविष्य से भी जुड़ा है। अब देखना होगा कि प्रशासन इन शिकायतों के आधार पर रिकॉर्ड सत्यापन और भौतिक सीमांकन की दिशा में क्या कदम उठाता है।
