2016 से 2024 तक घूमती रही फाइल, जांच रिपोर्ट फिर भी गायब! राघुवेंद्र मिश्रा प्रकरण में NHM के स्मरण पत्रों ने खोली प्रशासनिक जवाबदेही की परत

2016 से 2024 तक घूमती रही फाइल, जांच रिपोर्ट फिर भी गायब! राघुवेंद्र मिश्रा प्रकरण में NHM के स्मरण पत्रों ने खोली प्रशासनिक जवाबदेही की परत

रीवा - स्वास्थ्य विभाग की पुरानी पत्रावलियों से सामने आ रहे दस्तावेज अब एक ऐसे प्रशासनिक प्रश्न को जन्म दे रहे हैं, जिसका उत्तर केवल किसी एक शिकायत या एक अधिकारी के कथित कृत्य में नहीं, बल्कि जांच प्रक्रिया के वर्षों तक लंबित रहने की पूरी निर्णय-श्रृंखला में छिपा है। संविदा डीसीएम-डीपीएम राघुवेंद्र मिश्रा से संबंधित शिकायतों के मामले में जिला स्तर पर पत्राचार, जांच के निर्देश, स्मरण पत्र और अंततः राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, भोपाल द्वारा स्वयं जांच प्रतिवेदन तलब किए जाने के दस्तावेज सामने हैं। मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, शिकायतों के परीक्षण के लिए जिला स्तर पर कार्रवाई अपेक्षित थी, लेकिन लंबे समय तक जांच प्रतिवेदन मुख्यालय तक उपलब्ध नहीं हुआ। ऐसे में अब मूल सवाल यह नहीं है कि शिकायत में लगाए गए आरोप सही थे अथवा नहीं, पहला सवाल यह है कि शिकायत की जांच को उसके तार्किक प्रशासनिक निष्कर्ष तक पहुंचाया क्यों नहीं गया?

22 दिसंबर 2016 से 2024 तक, पत्रावली चलती रही, लेकिन निष्कर्ष कहां रहा? 

उपलब्ध प्रकरण संबंधी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2016 में तत्कालीन CMHO स्तर से राघुवेंद्र मिश्रा से संबंधित वित्तीय प्रकरण को लेकर पत्राचार हुआ था, जिसमें ₹6,36,493 की शासकीय राशि से संबंधित गंभीर वित्तीय आपत्तियों-क्षति का उल्लेख सामने आया है। यदि मूल जांच प्रतिवेदन में वास्तव में संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी और शासकीय राशि के गबन का निष्कर्ष दर्ज है, तो उस निष्कर्ष की विधिक एवं प्रशासनिक स्थिति आज भी स्पष्ट होना आवश्यक है। क्या उसके बाद विभागीय कार्रवाई प्रारंभ हुई? वित्तीय क्षति की वसूली की गई? संबंधित अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी हुआ? सक्षम प्राधिकारी ने अंतिम आदेश पारित किया? जांच निष्कर्ष को किसी अपील, पुनरीक्षण या अन्य आदेश से बदला गया? अथवा प्रकरण बिना अंतिम निर्णय के ही लंबित रहा? इन सवालों का उत्तर आरोप नहीं, मूल नस्ती और सक्षम आदेश ही दे सकते हैं।

2022 में CMHO ने रीवा से बाहर स्थानांतरण की मांग की-फिर हुआ क्या? 

प्रकरण की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी वर्ष 2022 के तत्कालीन CMHO, जिला रीवा के पत्र से सामने आती है। उपलब्ध पत्र में राघुवेंद्र मिश्रा, संविदा डीसीएम, जिला रीवा के कार्य एवं दायित्वों के निर्वहन को लेकर विभिन्न प्रशासनिक आपत्तियों का उल्लेख करते हुए उन्हें रीवा जिले से बाहर स्थानांतरित किए जाने का अनुरोध मिशन संचालक, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, भोपाल से किया गया था। पत्र में विभागीय कार्यों की समीक्षा, पोर्टल पर जानकारी, आशा-ऊषा, सुपरवाइजर से संबंधित कार्य, मातृ-शिशु स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, आशा प्रशिक्षण की समीक्षा, ATP एवं टूर डायरी तथा स्वास्थ्य संस्थाओं के भ्रमण जैसे कार्यों के निर्वहन को लेकर आपत्तियां दर्ज होने की बात सामने आती है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बिंदुओं को तत्कालीन CMHO की प्रशासनिक आपत्तियां माना जाना चाहिए, इनका अंतिम तथ्यात्मक निर्धारण संबंधित अभिलेखों और सक्षम जांच से ही होगा। लेकिन इसके बावजूद एक बड़ा प्रशासनिक प्रश्न कायम है, जब जिला स्तर के सक्षम अधिकारी ने स्थानांतरण का औपचारिक अनुरोध किया, तो उस पत्र पर मिशन संचालक स्तर पर क्या निर्णय हुआ? यदि स्थानांतरण हुआ तो आदेश कहां है? यदि नहीं हुआ तो अस्वीकृति या रोक का आदेश कहां है? यदि अधिकारी को रीवा में ही बनाए रखा गया तो किस सक्षम प्राधिकारी के आदेश और किस प्रशासनिक आधार पर?

NHM भोपाल ने 2024 में फिर मांगी जांच रिपोर्ट- तो वर्षों तक रिपोर्ट गई कहां? 

प्रकरण की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कड़ी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्यप्रदेश के 13 दिसंबर 2024 के पत्र से सामने आती है। उपलब्ध पत्र में संविदा डीसीएम राघुवेंद्र मिश्रा के विरुद्ध शिकायत संबंधी प्रकरणों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि इन शिकायतों की जांच के लिए पूर्व में CMHO रीवा को पत्र एवं स्मरण पत्र भेजे गए थे, लेकिन लंबे समय के बाद भी जांच प्रतिवेदन प्राप्त नहीं हुआ। इसके बाद NHM स्तर से संबंधित स्वास्थ्य प्रशासन को निर्देशित किया गया कि शिकायत में उल्लिखित बिंदुओं की सूक्ष्म जांच कर स्पष्ट अभिमत सहित जांच प्रतिवेदन निर्धारित समयसीमा में उपलब्ध कराया जाए। यही बिंदु पूरे प्रकरण को सामान्य शिकायत से उठाकर प्रशासनिक अनुश्रवण और जवाबदेही के स्तर पर ले जाता है। क्योंकि जब मुख्यालय को स्वयं यह पूछना पड़े कि जांच प्रतिवेदन अभी तक प्राप्त क्यों नहीं हुआ? तो अगला सवाल स्वाभाविक है, जांच की फाइल आखिर किस स्तर पर लंबित रही?

जांच प्रतिवेदन बना ही नहीं या बनकर दबा रहा, दोनों की जवाबदेही अलग है! 

यहां जांच की दिशा बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए। यदि प्रतिवेदन बना ही नहीं, तो जांच अधिकारी की भूमिका, उसे दिए गए निर्देश, उपलब्ध कराए गए अभिलेख और निर्धारित समयसीमा की समीक्षा जरूरी है। यदि प्रतिवेदन तैयार हो गया था, लेकिन आगे नहीं भेजा गया, तो फाइल की मूवमेंट, नोटशीट और उसे लंबित रखने वाले स्तर की पहचान आवश्यक है। यदि प्रतिवेदन किसी अधिकारी के पास परीक्षणाधीन था, तो कितने समय तक और किस कारण? और यदि किसी सक्षम प्राधिकारी ने जांच को स्थगित, निरस्त अथवा अन्य प्रकार से निस्तारित किया था, तो उस आदेश की प्रति नस्ती में होनी चाहिए। यही प्रशासनिक पारदर्शिता है।

 प्रभावशाली कौन?’- अब यह सवाल व्यक्ति नहीं, अभिलेख तय करेंगे! 

किसी अधिकारी को बिना ठोस प्रमाण किसी व्यक्ति या समूह का संरक्षण प्राप्त होने का निष्कर्ष देना उचित नहीं होगा। लेकिन दस्तावेजों की श्रृंखला अपने आप में एक वैध प्रशासनिक प्रश्न अवश्य खड़ा करती है, शिकायत हुई। जांच का निर्देश हुआ। स्मरण पत्र जारी हुए। CMHO स्तर से प्रशासनिक आपत्तियां दर्ज हुईं। स्थानांतरण का अनुरोध हुआ। फिर NHM भोपाल को स्वयं जांच प्रतिवेदन तलब करना पड़ा। तो फिर जांच की प्रशासनिक परिणति कहां है? यहीं से “किसका प्रभाव था?” जैसे अनुमानात्मक सवाल से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है कि किस सक्षम अधिकारी के पास फाइल थी? किस तारीख को थी? क्या निर्णय हुआ? और उस निर्णय का अभिलेखीय आधार क्या था? यही सवाल किसी भी निष्पक्ष जांच को व्यक्ति-केंद्रित आरोपों से निकालकर संस्थागत जवाबदेही के केंद्र में ले जाते हैं।

2016 की वित्तीय नस्ती और 2022 की प्रशासनिक आपत्तियां- क्या कभी एक साथ पढ़ी गईं? 

यह प्रकरण केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग शिकायतें सामने आईं। महत्वपूर्ण यह है कि यदि 2016 के वित्तीय प्रकरण का कोई अंतिम जांच निष्कर्ष अभिलेख में मौजूद था और 2022 में उसी अधिकारी के कार्य निष्पादन को लेकर तत्कालीन CMHO ने अलग से प्रशासनिक आपत्तियां दर्ज करते हुए स्थानांतरण का अनुरोध किया, तो यह जांच का विषय होना चाहिए कि क्या दोनों पत्रावलियों को कभी एक साथ परीक्षण में लिया गया? यदि लिया गया तो क्या निर्णय हुआ? यदि नहीं लिया गया तो क्यों? और 2016 के बाद संबंधित अधिकारी को दिए गए पद, प्रभार अथवा दायित्वों का प्रशासनिक आधार क्या था?

अब 2016 से 2024 तक की पूरी ‘फाइल मूवमेंट’ सामने आनी चाहिए! 

इस मामले में प्रभावी जांच का अर्थ केवल पुराने आरोपों को दोहराना नहीं होगा। आवश्यकता है कि पूरी प्रशासनिक समयरेखा सामने रखी जाए- 22 दिसंबर 2016- वित्तीय प्रकरण से संबंधित पत्राचार। 2022- तत्कालीन CMHO द्वारा कार्यप्रणाली पर आपत्तियां और रीवा से बाहर स्थानांतरण का अनुरोध। 15 सितंबर 2022- शिकायत-जांच संबंधी पत्राचार की महत्वपूर्ण कड़ी। 16 नवंबर 2023-  NHM स्तर से संबंधित प्रकरण में स्मरण-अनुवर्ती कार्रवाई। 13 दिसंबर 2024- NHM भोपाल द्वारा लंबित जांच प्रतिवेदन पर पुनः निर्देश और सूक्ष्म जांच सहित स्पष्ट अभिमत की मांग। अब इन तारीखों के बीच की नोटशीट, पत्रावली क्रमांक, जांच अधिकारी की नियुक्ति, प्राप्त जवाब, जांच प्रतिवेदन, अग्रेषण, परीक्षण और अंतिम आदेश सामने आने चाहिए। यही बताएगा कि प्रशासनिक विलंब वास्तव में कहां हुआ।

अब सवाल ‘संरक्षण’ का नहीं, ‘प्रशासनिक निर्णय’ का है! 

किसी को “संरक्षित” कहना निष्कर्ष है, लेकिन किसी अधिकारी को बनाए रखने अथवा हटाने का निर्णय आदेश और नस्ती से प्रमाणित होता है। इसलिए जांच का प्रश्न सीधा होना चाहिए कि CMHO ने हटाने की मांग की तो मिशन संचालक कार्यालय ने क्या किया? NHM ने जांच मांगी तो जिला स्तर पर किसे जिम्मेदारी दी गई? स्मरण पत्रों के बाद भी रिपोर्ट क्यों नहीं आई? यदि रिपोर्ट तैयार थी तो उसे किस स्तर पर रोका गया? यदि रिपोर्ट तैयार नहीं थी तो जांच अधिकारी की जवाबदेही क्या रही? और यदि किसी स्तर पर प्रकरण निस्तारित हुआ तो अंतिम आदेश कहां है? इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला प्रक्रियागत विलंब, प्रशासनिक लापरवाही, अभिलेखीय अवरोध अथवा किसी अन्य कारण से लंबित रहा।

अब फाइल खुले तो केवल शिकायत नहीं, पूरी जवाबदेही का हिसाब निकले! 

इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू यह नहीं कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध कितनी शिकायतें हुईं। गंभीर प्रश्न यह है कि शिकायतों पर शासन-प्रशासन की संस्थागत प्रतिक्रिया कितनी प्रभावी रही। यदि NHM भोपाल के निर्देशों और स्मरण पत्रों के बावजूद जांच प्रतिवेदन लंबे समय तक उपलब्ध नहीं हुआ तो उस विलंब का उत्तरदायित्व भी उसी प्रशासनिक जांच का हिस्सा होना चाहिए। और यदि 2016 के वित्तीय प्रकरण में कोई प्रतिकूल निष्कर्ष विधिवत दर्ज था, तो उसकी वर्तमान प्रशासनिक स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए- वसूली हुई या नहीं, कार्रवाई हुई या नहीं, निष्कर्ष कायम रहा या बाद में बदला गया। क्योंकि सरकारी नस्ती में आरोप अंतिम सत्य नहीं होते और न ही जांच का आदेश अंतिम निष्कर्ष होता है। अंतिम सत्य अभिलेखों की पूरी श्रृंखला से निकलता है- शिकायत- जांच आदेश- जांच अधिकारी- अभिलेख परीक्षण- जांच प्रतिवेदन- सक्षम प्राधिकारी का निर्णय- कार्रवाई- अनुपालन। यदि इस श्रृंखला की कोई कड़ी वर्षों तक गायब है, तो वही कड़ी अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बन जाती है। अब जरूरत किसी को प्रभावशाली घोषित करने की नहीं- यह पता लगाने की है कि प्रशासनिक व्यवस्था में प्रभाव किसका था, यह नहीं, बल्कि निर्णय किसने लिया, किस आधार पर लिया और उस निर्णय का अभिलेख कहां है। क्योंकि इस प्रकरण में अब आरोपों से अधिक महत्वपूर्ण है- नस्ती का मौन। और जब नस्ती खुलेगी, तो बयान नहीं, नोटशीट और सक्षम अधिकारियों के आदेश बोलेंगे।

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