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| रीवा में NOC और क्षतिपूर्ति के बिना सरकारी सड़क की कटिंग? सीवरेज खुदाई पर PWD की चुप्पी से उठे सवाल |
रीवा। शहर में सीवरेज नेटवर्क के विस्तार के नाम पर रतहरा से चोरहटा मार्ग पर की गई सड़क खुदाई अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। आरोप है कि लोक निर्माण विभाग के अधीन बताई जा रही इस सरकारी सड़क की कटिंग से पहले विभाग से विधिवत NOC (अनापत्ति प्रमाण-पत्र) नहीं ली गई और न ही सड़क को होने वाले नुकसान की निर्धारित क्षतिपूर्ति राशि जमा कराई गई। यदि आरोप सही हैं तो यह मामला केवल सड़क की खुदाई तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा, विभागीय निगरानी और नियमों के पालन से भी जुड़ा हुआ है।
रतहरा-चोरहटा मार्ग रीवा के महत्वपूर्ण मार्गों में शामिल है। इसी सड़क पर सीवरेज नेटवर्क बिछाने के लिए मेसर्स सहज कंस्ट्रक्शन, सूरत द्वारा खुदाई किए जाने की जानकारी सामने आई है। सीवरेज परियोजना निश्चित रूप से शहर के लिए आवश्यक और जनहित से जुड़ी योजना हो सकती है, लेकिन किसी भी विकास कार्य के लिए सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने से पहले निर्धारित अनुमति और तकनीकी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
सबसे पहला सवाल यही है कि क्या सड़क काटने से पहले PWD रीवा से लिखित NOC ली गई थी? यदि अनुमति ली गई थी तो उसकी प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं है? संबंधित विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किस आदेश के तहत सड़क की कटिंग की अनुमति दी गई और परियोजना के लिए सड़क के किस हिस्से को खोदने की स्वीकृति दी गई।
दूसरा बड़ा सवाल क्षतिपूर्ति राशि को लेकर है। सरकारी सड़क की खुदाई से उसकी सतह, बेस और अन्य संरचनात्मक हिस्सों को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में सड़क को मूल स्थिति में बहाल करने की लागत का आकलन किया जाना आवश्यक है। यदि नियमानुसार कोई क्षतिपूर्ति राशि निर्धारित की गई थी तो क्या वह राशि संबंधित विभाग के खाते में जमा हुई? यदि राशि जमा हुई है तो कितनी और किस आधार पर? और यदि जमा नहीं हुई तो बिना भुगतान के सड़क की कटिंग कैसे होने दी गई?
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि सड़क की खुदाई केवल ऊपर की सतह हटाने तक सीमित नहीं होती। सीवरेज पाइपलाइन के लिए सड़क की लंबाई, चौड़ाई और गहराई के अनुसार खुदाई की जाती है। इससे सड़क की मूल संरचना प्रभावित हो सकती है। यदि खुदाई के बाद सड़क की बहाली तकनीकी मानकों के अनुसार नहीं की गई तो भविष्य में धंसाव, गड्ढे और दुर्घटनाओं की स्थिति पैदा हो सकती है।
यही कारण है कि सड़क की बहाली को केवल मिट्टी डालकर या ऊपर से डामर बिछाकर पूरा मान लेना उचित नहीं होगा। संबंधित तकनीकी अधिकारियों को यह देखना होगा कि सड़क की मूल संरचना किस स्तर तक प्रभावित हुई और उसे पुनः स्थापित करने में निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन किया गया या नहीं।
इस पूरे मामले में PWD की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि सड़क वास्तव में लोक निर्माण विभाग के अधीन है तो विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि उसकी अनुमति के बिना किसी एजेंसी या ठेकेदार को सड़क काटने की अनुमति न दी जाए। यदि अनुमति दी गई थी तो उसके दस्तावेज, शर्तें और क्षतिपूर्ति की जानकारी स्पष्ट होनी चाहिए। वहीं यदि बिना अनुमति सड़क काटी गई, तो विभाग ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की—यह भी जांच का विषय है।
यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल विभागीय निगरानी का है। किसी सरकारी सड़क पर बड़े स्तर पर खुदाई होने के बावजूद यदि संबंधित विभाग को इसकी जानकारी बाद में मिलती है तो यह निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। सड़क निर्माण और रखरखाव पर सरकार बड़ी राशि खर्च करती है। ऐसे में सरकारी संपत्ति की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार विभागों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी अन्य परियोजना के लिए सड़क की संरचना में बदलाव नियमों के अनुसार ही हो।
सीवरेज परियोजना के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि शहर के भविष्य के लिए भूमिगत सीवरेज नेटवर्क जरूरी है। यह बात अपनी जगह सही है। लेकिन जनहित की परियोजना होने का अर्थ यह नहीं कि उसके लिए नियमों को नजरअंदाज कर दिया जाए। बल्कि बड़ी और महत्वपूर्ण परियोजनाओं में पारदर्शिता और नियमों का पालन और अधिक जरूरी हो जाता है।
यदि सड़क कटिंग के लिए NOC ली गई है तो उसे सार्वजनिक करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसी तरह क्षतिपूर्ति राशि जमा हुई है तो उसकी रसीद और राशि की जानकारी भी सामने आनी चाहिए। इससे न केवल सवालों का जवाब मिलेगा, बल्कि परियोजना को लेकर बनी आशंकाएं भी दूर होंगी।
जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग पूरे मामले की संयुक्त तकनीकी जांच कराए। जांच में सड़क की कटिंग की वास्तविक लंबाई, चौड़ाई और गहराई का माप लिया जाए। सड़क की मूल संरचना को हुए नुकसान का तकनीकी मूल्यांकन किया जाए। इसके बाद यह देखा जाए कि सड़क बहाली में कितनी लागत आएगी और निर्धारित क्षतिपूर्ति राशि का भुगतान हुआ है या नहीं।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि सीवरेज परियोजना के लिए जिम्मेदार एजेंसी और निर्माण कंपनी को सड़क कटिंग की अनुमति किन शर्तों पर दी गई। यदि किसी शर्त का उल्लंघन हुआ है तो उसके लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा अंततः जनता को भुगतना पड़ता है। एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा विभाग उसी सड़क को खोदता है और तीसरा विभाग उसकी बहाली की जिम्मेदारी लेता है। यदि इन विभागों के बीच उचित समन्वय नहीं हो तो सरकारी धन का दोहरा खर्च होता है। पहले सड़क बनाने में पैसा लगता है और फिर उसे खोदने के बाद दोबारा उसी सड़क की मरम्मत पर सरकारी धन खर्च होता है।
इसलिए भविष्य की ऐसी परियोजनाओं के लिए पहले से स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है। सड़क काटने से पहले अनुमति, तकनीकी स्वीकृति, क्षतिपूर्ति, सुरक्षा उपाय और बहाली की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। काम पूरा होने के बाद संबंधित विभाग को यह प्रमाणित करना चाहिए कि सड़क निर्धारित मानकों के अनुसार बहाल कर दी गई है।
इस पूरे मामले में सवाल सीवरेज परियोजना का विरोध करने का नहीं, बल्कि नियमों के पालन का है। शहर को सीवरेज नेटवर्क चाहिए, बेहतर सड़कें भी चाहिए और सरकारी धन की बचत भी जरूरी है। विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब एक सार्वजनिक सुविधा तैयार करने के लिए दूसरी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के बाद उसकी जिम्मेदारी भी तय हो।
अब गेंद संबंधित विभागों के पाले में है। क्या PWD रीवा से सड़क कटिंग की विधिवत NOC ली गई थी? क्या निर्धारित क्षतिपूर्ति राशि जमा हुई? सड़क को कितना नुकसान पहुंचा और उसकी बहाली किस तकनीकी मानक के तहत की गई? इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आने चाहिए।
क्योंकि असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकारी सड़क क्यों काटी गई, बल्कि यह भी है कि किसकी अनुमति से काटी गई, सरकारी खजाने को उसकी क्षति की भरपाई हुई या नहीं और पूरी प्रक्रिया के दौरान निगरानी करने वाले जिम्मेदार अधिकारी कहां थे?
