रीवा-मऊगंज में स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल: अवैध क्लीनिकों, बिना पंजीयन चिकित्सा और दवा बिक्री के नेटवर्क के आरोप, व्यापक जांच की उठी मांग

रीवा-मऊगंज में स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल: अवैध क्लीनिकों, बिना पंजीयन चिकित्सा और दवा बिक्री के नेटवर्क के आरोप, व्यापक जांच की उठी मांग

रीवा - संभाग के सबसे बड़े अस्पताल में रीवा जिले की कल्पना मिश्रा की जच्चा बच्चा की मृत्यु के बाद गाँधी मेमोरियल अस्पताल और रीवा संभाग की बड़ी-बड़ी हॉस्पिटलों की चर्चाएं व्यापक पैमाने पर होना शुरू हो गई जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष सामाजिक संगठन सभी ने खुलकर बोलना शुरू किया जिस पर जिला और संभाग के अधिकारियों ने भी अपने स्तर से व्यवस्था सुधारने का ढिडोरा पीटा गया जबकि वास्तविकता यह है कि रीवा संभाग में वर्तमान समय पर 4000 से ऊपर अवैध चिकित्सक या तो मोटरसाइकिल से घूम घूम कर दवा कर रहे हैं या तो फिर गांव में गुमनाम छोटी-मोटी क्लिनिक खोल लिए हैं या अपने प्रचार प्रसार के दम पर अवैध चिकित्सक अपनी क्लिनिक में नामी डॉक्टरों का नाम लिखकर के क्लीनिक संचालित कर रहे हैं हम प्रमुख रूप से बात कर रहे हैं रीवा और नवीन मऊगंज जिले की यहां करोड़ नहीं अरबो रुपए की दवा शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक बिक्री होती है और मेडिकल स्टोर संचालक करोड़ के मालिक हो चुके हैं किंतु आज तक स्वास्थ्य विभाग और संभागीय और जिले के वरिष्ठ अधिकारी अवैध चिकित्सकों पर कार्यवाही नहीं कर सके मेडिकल स्टोर से दवा थोक से या फुटकर कितनी उठाई गई और वह दवा किस डॉक्टर की पर्ची पर किस मरीज को दी गई जबकि रजिस्टर में फुटकर विक्रेता को रजिस्टर पर सब यह बात लेखबद्ध करनी होती है लेकिन अभी न देने वाला खुलकर बोल रहा है ना लेने वाला खुलकर बोल रहा है पर इन अवैध संचालकों में दो-तीन विभागों की प्रमुख भूमिका मानी जा रही है और करोड़ों करोड़ रुपए प्रति माह सेवा शुल्क और शेष व्यापारी करोड़पति हो रहा है स्वास्थ्य विभाग से जुड़े हुए व्यक्तियों की संपत्ति  मे जिस गति से वृद्धि हो रही है वह निश्चित सरकार और प्रशासन के लिए निश्चित ही अति संवेदनशील है स्वास्थ्य के प्रति जिस तरह से गाँवों में आज चिकित्सक बोतल इंजेक्शन के नाम पर हजार से ₹2000 प्रति मारीज से लिए जाते हैं और यह भी चर्चा हो जाती है कि डॉक्टर साहब फीस नहीं ले रहे हैं चाहे अवैध चिकित्सक हो या वैद्य चिकित्सा के पैथोलॉजी या अन्य जांच के साथ दवा में संबंधित डॉक्टरों का कमीशन फिक्स रहता है यदि इनकी गोपनीय जांच की जाए तो वास्तविकता सामने आ सकती है समाचार मुख्य सूत्रों के आधार पर समाचार प्रकाशित कर रहा है इसकी सत्यता तो अधिकारियों की जाँच के बाद ही  प्रेस विज्ञप्ति मे ही इन बातों की पुष्टि हो सकेगी!

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