| दिग्विजय सिंह का बड़ा खुलासा: 22 साल की उम्र में मिला था जनसंघ में शामिल होने का ऑफर, ठुकराकर चुनी कांग्रेस |
रीवा - मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने साल 1972 को लेकर एक चौंकाने वाला और बड़ा राजनीतिक खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि राजनीति के शुरुआती दिनों में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और जनसंघ (जो अब भाजपा है) में शामिल होने का खुला ऑफर मिला था, लेकिन उन्होंने इसे ठुकराकर कांग्रेस पार्टी का दामन थामा ।
दिग्विजय सिंह के इस पूरे बयान और खुलासे के आधार पर तैयार विस्तृत समाचार नीचे दिया गया है:
22 साल की उम्र में मिला था जनसंघ का ऑफर
दिग्विजय सिंह ने अपने शुरुआती जीवन का जिक्र करते हुए बताया कि वे राजनीति में आने से पहले इंजीनियरिंग के एक अच्छे छात्र थे और खेलों (क्रिकेट, हॉकी, टेनिस और स्क्वैश) में यूनिवर्सिटी व नेशनल स्तर पर सक्रिय थे । वे मास्टर्स की पढ़ाई के लिए अमेरिका की इलिनोइस यूनिवर्सिटी (Illinois University) जाने वाले थे, लेकिन पिता के आकस्मिक निधन के कारण उन्हें देश में ही रुकना पड़ा।
इसके बाद, मात्र 22 साल की उम्र में वे सर्वसम्मति से नगर पालिका अध्यक्ष चुन लिए गए । उस समय गुना लोकसभा क्षेत्र से राजमाता विजयाराजे सिंधिया सांसद थीं और उन्होंने जनसंघ ज्वाइन कर ली थी । दिग्विजय सिंह की लोकप्रियता को देखते हुए जनसंघ के तत्कालीन बड़े नेता कैलाश सारंग और कुशाभाऊ ठाकरे उन्हें जनसंघ में शामिल करने के लिए लगातार अपने साथ दौरों पर ले जाने लगे और उन्हें प्रभावित करने की कोशिश की ।
सावरकर और गोलवलकर की किताबें देकर प्रभावित करने की कोशिश
दिग्विजय सिंह ने खुलासा किया कि जनसंघ और आरएसएस के लोग उन्हें अपनी विचारधारा से जोड़ने के लिए गुरु गोलवलकर और वीर सावरकर की किताबें पढ़ने के लिए छोड़ गए थे। इसी दौरान, मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह (जो गुना में शिकार खेलने आया करते थे) को इस बात की भनक लगी। उन्होंने दिग्विजय सिंह को अकेले में बुलाया और सलाह दी, "राजा, तुमको जनसंघ वाले अपनी पार्टी में शामिल करना चाहते हैं, लेकिन तुम मेरी बात मानो और कांग्रेस ज्वाइन करो। जब दिग्विजय सिंह ने उन्हें बताया कि जनसंघ के लोग उन्हें सावरकर और गोलवलकर की किताबें दे गए हैं, तो मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह ने एक ऐतिहासिक सलाह दी। उन्होंने कहा, "तुम वो किताबें भी पढ़ो, लेकिन उनके साथ-साथ महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबा साहब अंबेडकर को भी पढ़ो और रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर किताब 'संस्कृति के चार अध्याय' को भी जरूर पढ़ो।"
बोर्डिंग स्कूल की परवरिश और विचारधारा की वजह से चुनी कांग्रेस
दिग्विजय सिंह ने बताया कि उन्होंने सभी किताबें पढ़ीं, लेकिन वे जनसंघ की विचारधारा से सहमत नहीं हो सके । इसके पीछे उन्होंने अपने बचपन के माहौल का हवाला दिया। उन्होंने कहा, "मैं 4 साल की उम्र में बोर्डिंग स्कूल चला गया था, जहाँ हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई—हम सभी धर्मों के बच्चे एक साथ मिलकर रहते थे। इसलिए मेरे मन में कभी भेदभाव नहीं था और मुझे जनसंघ की विचारधारा समझ में ही नहीं आई। इसके बाद उन्होंने राजमाता विजयाराजे सिंधिया से साफ कह दिया कि वे जनसंघ में नहीं आ सकते और उन्होंने 1972 में आधिकारिक तौर पर कांग्रेस की सदस्यता ले ली। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और जनसंघ में एक बुनियादी फर्क है। कांग्रेस 'सर्वधर्म समभाव', अनेकता में एकता, सामाजिक समरसता और सनातन धर्म के मूल मंत्र 'वसुधैव कुटुंबकम' पर चलती है, जहाँ हर नागरिक को अपनी आस्था के पालन का समान अधिकार है । इसके विपरीत, आज की भाजपा, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद सिर्फ मुसलमानों और ईसाइयों के विरोध की राजनीति करते हैं, जिसके खिलाफ उनका विरोध 1972 से आज तक जारी है।
RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयानों से भाजपा को दिखाया आईना
भाषण के अंतिम हिस्से में दिग्विजय सिंह ने वर्तमान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयानों का हवाला देते हुए भाजपा नेताओं पर तीखा तंज कसा । उन्होंने कहा कि जो बातें वे साल 1972 से बोल रहे हैं और जिसके लिए सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर) पर उन्हें "मुसलमान या ईसाई" कहकर गालियां दी जाती हैं, आज वही भाषा मोहन भागवत बोल रहे हैं
उन्होंने मोहन भागवत के अमेरिका में दिए बयानों को पढ़कर सुनाया, जिसमें भागवत ने कहा था:
1. "अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह जाता।"
2. "हिंदू राष्ट्र की अवधारणा का मतलब मुसलमानों को भारत से बाहर निकालना या पाकिस्तान भेजना नहीं है।"
3. "विविधता और अनेकता में एकता भारत के डीएनए (DNA) में है।"
दिग्विजय सिंह ने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जैसे भाजपा नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा के नेता चुनाव हारने पर पाकिस्तान में पटाखे फूटने और विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं, लेकिन अब उनके खुद के संघ प्रमुख मोहन भागवत मेरी ही भाषा बोलकर इन नेताओं को आईना दिखा रहे हैं