रीवा-मऊगंज की स्वास्थ्य व्यवस्था में अटैचमेंट पर उठे गंभीर सवाल, करीब 200 कर्मचारियों की तैनाती का रिकॉर्ड जांच के घेरे में

रीवा-मऊगंज की स्वास्थ्य व्यवस्था में अटैचमेंट पर उठे गंभीर सवाल, करीब 200 कर्मचारियों की तैनाती का रिकॉर्ड जांच के घेरे में

रीवा। रीवा एवं मऊगंज जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर अब सवाल केवल डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों की क्षमता या ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता तक सीमित नहीं हैं। स्वास्थ्य विभाग में मानव संसाधन के कथित पुनर्विन्यास और लंबे समय से चल रही ड्यूटी एवं अटैचमेंट व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इसी मामले में संभागायुक्त रीवा संभाग, स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और मुख्यमंत्री स्तर तक उच्चस्तरीय, स्वतंत्र एवं अभिलेखीय जांच की मांग पहुंचाई गई है।

शिकायत में करीब 200 चिकित्सकों, पीजीएमओ, नर्सिंग अधिकारियों और पैरामेडिकल स्टाफ के ड्यूटी अथवा अटैचमेंट से जुड़े होने की जानकारी का रिकॉर्ड से सत्यापन कराने की मांग की गई है। हालांकि यह संख्या वास्तविक है या नहीं, इसका निर्धारण विभागीय अभिलेखों की जांच के बाद ही हो सकेगा। यदि रिकॉर्ड में इतनी बड़ी संख्या प्रमाणित होती है तो मामला किसी एक कर्मचारी या एक-दो ड्यूटी आदेशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जिले की पूरी स्वास्थ्य मानव संसाधन व्यवस्था की प्रशासनिक समीक्षा का विषय बन सकता है।

अस्थायी ड्यूटी व्यवस्था कब बन जाती है स्थायी?

प्रशासनिक आवश्यकता के चलते किसी कर्मचारी को सीमित अवधि के लिए दूसरी स्वास्थ्य संस्था में ड्यूटी देना सामान्य प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब यही व्यवस्था लगातार दोहराई जाए और ड्यूटी आदेशों की अवधि समाप्त होने के बाद भी कर्मचारी लंबे समय तक मूल पदस्थापना से बाहर काम करता रहे।

ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी होगा कि ड्यूटी की आवश्यकता किस स्तर पर तय की गई, आदेश किस सक्षम अधिकारी ने जारी किया, अवधि कितनी निर्धारित की गई और अवधि समाप्त होने के बाद उसकी समीक्षा किसने की। साथ ही यह भी देखना होगा कि जिस मूल संस्था से कर्मचारी को हटाया गया, वहां उत्पन्न हुई कमी की भरपाई कैसे की गई।

पीजीएमओ की तैनाती पर भी उठे सवाल

शिकायत में पीजीएमओ डॉक्टरों को उपस्वास्थ्य केंद्रों सहित अन्य संस्थानों में लंबे समय तक ड्यूटी पर लगाए जाने का मुद्दा भी उठाया गया है। यहां सवाल किसी चिकित्सक की कार्यनिष्ठा का नहीं, बल्कि मानव संसाधन के संस्थागत उपयोग का है।

जांच में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी होगा कि संबंधित चिकित्सक की मूल पदस्थापना क्या थी, दूसरी संस्था में ड्यूटी देने की आवश्यकता क्यों पड़ी, आदेश की अवधि कितनी थी और क्या प्रत्येक विस्तार के लिए सक्षम स्तर से अनुमति ली गई। यदि अस्थायी ड्यूटी लंबे समय तक जारी रही है तो उसकी प्रशासनिक समीक्षा भी रिकॉर्ड में होनी चाहिए।

संजीवनी क्लिनिकों में भी मानव संसाधन का परीक्षण जरूरी

शिकायत में शहरी संजीवनी क्लिनिकों में भी विभिन्न संस्थानों से स्वास्थ्यकर्मियों को ड्यूटी के नाम पर लगाए जाने का उल्लेख किया गया है। यदि रिकॉर्ड में ऐसी व्यवस्था बड़े पैमाने पर सामने आती है तो प्रशासन के सामने यह सवाल होगा कि शहरी स्वास्थ्य संस्थानों की मानव संसाधन जरूरत स्वीकृत पदों के अनुरूप पूरी की जा रही थी या ग्रामीण एवं अन्य स्वास्थ्य संस्थानों से कर्मचारियों को स्थानांतरित कर अस्थायी व्यवस्था बनाई जा रही थी।

इसका सीधा असर ग्रामीण स्वास्थ्य संस्थानों की सेवाओं पर पड़ता है या नहीं, यह जानने के लिए संस्थानवार मानव संसाधन ऑडिट जरूरी होगा।

कागज पर पदस्थ, लेकिन वास्तविक ड्यूटी कहां?

पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि किसी कर्मचारी की सेवा पुस्तिका में मूल पदस्थापना एक संस्था की हो सकती है, लेकिन यदि वह लंबे समय से किसी दूसरी जगह ड्यूटी कर रहा है तो कागजी पदस्थापना और वास्तविक सेवा-स्थल के बीच अंतर पैदा हो सकता है।

इसलिए जांच केवल ड्यूटी आदेशों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पदस्थापना आदेश, ड्यूटी आदेश, बायोमेट्रिक उपस्थिति, ड्यूटी रोस्टर, वेतन अभिलेख और वास्तविक कार्यस्थल का आपस में मिलान किया जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित कर्मचारी वास्तव में किस संस्था में कितनी अवधि तक सेवा दे रहा था।

200 कर्मचारियों की संख्या सही निकली तो बढ़ेगा दायरा

करीब 200 कर्मचारियों के अटैचमेंट की सूचना यदि विभागीय रिकॉर्ड में सही पाई जाती है तो प्रशासन के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल होंगे। कितने कर्मचारी ग्रामीण स्वास्थ्य संस्थानों से बाहर हैं? कितने पीजीएमओ मूल पदस्थापना से अलग कार्य कर रहे हैं? कितने नर्सिंग अधिकारी और पैरामेडिकल कर्मचारी अन्य संस्थानों में लगाए गए हैं? कितने आदेश छह महीने से अधिक पुराने हैं और कितने एक वर्ष से ज्यादा समय से जारी हैं?

इन सवालों के जवाब से ही यह पता चलेगा कि मामला सीमित प्रशासनिक आवश्यकता का है या लंबे समय से चली आ रही मानव संसाधन व्यवस्था का।

सीएमएचओ की भूमिका भी रिकॉर्ड से परखी जाए

इस मामले में किसी अधिकारी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि बड़े पैमाने पर ड्यूटी और अटैचमेंट की शिकायत सामने आई है तो निर्णय लेने की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की जांच आवश्यक होगी।

किस स्तर से मांग आई, किस अधिकारी ने आवश्यकता प्रमाणित की, आदेश किसने जारी किए, किसने अवधि बढ़ाई और मूल संस्थानों की स्थिति की समीक्षा किस स्तर पर हुई—इन सभी बिंदुओं की जानकारी विभागीय रिकॉर्ड से सामने आ सकती है। यदि सभी आदेश नियमों और वास्तविक प्रशासनिक आवश्यकता के अनुरूप पाए जाते हैं तो उनकी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। वहीं किसी प्रक्रिया संबंधी कमी के प्रमाण मिलने पर जिम्मेदारी भी उसी अभिलेखीय प्रक्रिया के आधार पर तय की जा सकती है।

ग्रामीण संस्थानों पर असर का भी हो तुलनात्मक ऑडिट

जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि जिस ग्रामीण संस्था से कर्मचारी हटाया गया, वहां स्वीकृत पद कितने हैं, वास्तविक उपलब्धता कितनी है और मरीजों का दबाव कितना है। इसके मुकाबले जिस संस्था में कर्मचारी की ड्यूटी लगाई गई, वहां स्वीकृत पद, मरीजों की संख्या और वास्तविक आवश्यकता क्या थी।

इस तुलनात्मक परीक्षण से पता चलेगा कि ड्यूटी व्यवस्था वास्तविक जरूरत के आधार पर बनाई गई थी या इससे किसी एक संस्था की कमी दूसरी संस्था के मानव संसाधन से पूरी हुई।

अब फाइलों से सामने आना चाहिए पूरा सच

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रशासनिक रिकॉर्ड की होगी। कर्मचारीवार और संस्थानवार सूची बनाकर मूल पदस्थापना, स्वीकृत पद, ड्यूटी आदेश, सक्षम स्वीकृति, अवधि, नवीनीकरण, उपस्थिति, मूल संस्था की स्थिति और वास्तविक कार्यस्थल का मिलान किया जाए तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।

यदि व्यवस्था नियमसम्मत है तो वही रिकॉर्ड उसका आधार बनेगा। यदि कहीं प्रक्रिया-विचलन या लंबे समय तक बिना पर्याप्त समीक्षा के कार्यव्यवस्था जारी रहने के तथ्य सामने आते हैं तो उनकी पहचान भी इसी रिकॉर्ड से होगी।

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