बारिश की बेरुखी से रीवा–मऊगंज के किसानों की बढ़ी चिंता, धान की फसल पर मंडराया संकट

बारिश की बेरुखी से रीवा–मऊगंज के किसानों की बढ़ी चिंता, धान की फसल पर मंडराया संकट

रीवा/मऊगंज - रीवा संभाग में अगस्त माह की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन अब तक सामान्य से कम वर्षा होने के कारण किसानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। जुलाई बीत जाने के बावजूद पर्याप्त बारिश नहीं होने से धान की बोई गई फसल कई क्षेत्रों में सूखने लगी है। खेतों में नमी की कमी साफ दिखाई दे रही है, जिससे अन्नदाता भविष्य की फसल को लेकर चिंतित है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगामी दिनों, विशेषकर 15 अगस्त तक पर्याप्त वर्षा नहीं हुई, तो रीवा और नवीन जिला मऊगंज में धान उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है और धान यहां की प्रमुख खरीफ फसल है। ऐसे में वर्षा की कमी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

किसानों का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। महंगे बीज, उर्वरक, जुताई, सिंचाई और मजदूरी का खर्च पहले ही उनकी कमर तोड़ रहा है। दूसरी ओर, वर्षा नहीं होने से सिंचाई के सीमित साधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। जिन किसानों के पास निजी सिंचाई की व्यवस्था नहीं है, वे सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

रीवा और मऊगंज के अनेक किसान बटाई पर या पट्टे पर जमीन लेकर खेती करते हैं। ऐसे किसानों के पास कई बार भूमि संबंधी अभिलेख नहीं होते, जिसके कारण उन्हें सरकारी योजनाओं या राहत पैकेजों का लाभ मिलने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। यही वर्ग वर्तमान परिस्थिति में सबसे अधिक संकटग्रस्त माना जा रहा है।

कृषि संकट का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण परिवारों के सामने बच्चों की पढ़ाई, स्कूल सामग्री, घरों की मरम्मत, दवाइयों और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी चुनौती बनती जा रही है। यदि फसल प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

किसानों ने एक अन्य गंभीर समस्या आवारा पशुओं की भी बताई है। उनका कहना है कि फसल तैयार होने से पहले ही आवारा मवेशी खेतों में घुसकर भारी नुकसान पहुंचाते हैं। किसानों का सुझाव है कि सरकार सामूहिक फेंसिंग, गौ संरक्षण और फसल सुरक्षा जैसी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करे, ताकि किसानों की मेहनत सुरक्षित रह सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण, सामूहिक सिंचाई परियोजनाएं, तालाबों का पुनर्जीवन, छोटे जलाशयों का निर्माण तथा सामुदायिक बोरवेल जैसी योजनाओं को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। इससे भविष्य में वर्षा पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सकती है और किसानों को राहत मिल सकती है।

रीवा और मऊगंज क्षेत्र लंबे समय से धान और गेहूं के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में गिने जाते हैं। यदि इस वर्ष भी वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो इसका प्रभाव न केवल किसानों की आय पर पड़ेगा बल्कि क्षेत्रीय कृषि उत्पादन और बाजार व्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है। ऐसे में किसानों की निगाहें अब आसमान की ओर टिकी हैं और वे समय पर अच्छी बारिश की उम्मीद कर रहे हैं।




Post a Comment

Previous Post Next Post