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| स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद भी बड़ी चुनौती: क्या जातिवाद और वंशवाद भारत के विकास में सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं? |
रीवा - देशभर में आगामी स्वतंत्रता दिवस की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे समय में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच यह चर्चा भी तेज हो रही है कि भारत ने आतंकवाद, उग्रवाद और अनेक राष्ट्रीय चुनौतियों का मजबूती से सामना किया है, लेकिन सामाजिक स्तर पर जातिवाद, वंशवाद और संकीर्ण स्वार्थ जैसी प्रवृत्तियां आज भी देश के समग्र विकास के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
सामाजिक चिंतकों का कहना है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हर जाति, हर वर्ग, हर धर्म और हर क्षेत्र के लोगों ने समान रूप से योगदान दिया था। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने परिवार और निजी हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना। उनके त्याग और बलिदान के कारण ही आज देश स्वतंत्र है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में आगे बढ़ रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि स्वतंत्रता के बाद देश ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, संचार, विज्ञान, कृषि और तकनीक सहित अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। कभी भोजन, वस्त्र और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करने वाला भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके बावजूद सामाजिक असमानता, जातीय ध्रुवीकरण और वंशवादी राजनीति को लेकर चिंताएं लगातार सामने आती रही हैं।
समाज के कई वर्गों का मत है कि लगभग सभी समुदायों में प्रभावशाली और संपन्न वर्ग अपने सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने का प्रयास करता है। आलोचकों का कहना है कि कई स्थानों पर राजनीतिक पदों और नेतृत्व में वंशवाद का प्रभाव दिखाई देता है, जिससे नए और योग्य लोगों के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम निर्णय जनता के मत से होता है और मतदाता ही अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश को विकसित राष्ट्र बनाना है तो जाति, धर्म और वर्ग की सीमाओं से ऊपर उठकर समान अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पारदर्शी प्रशासन और ईमानदार नेतृत्व को बढ़ावा देना होगा। उनका कहना है कि हर गरीब बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध हो, चाहे वह सामान्य शिक्षा हो, चिकित्सा, इंजीनियरिंग या अन्य उच्च शिक्षा। साथ ही स्वास्थ्य सेवाएं और न्याय व्यवस्था भी आम नागरिक की पहुंच में सरल, सुलभ और प्रभावी होनी चाहिए।
विधि विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका, प्रशासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। न्याय समय पर और निष्पक्ष रूप से मिले, यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। समाज में बढ़ते विवादों और सामाजिक तनाव को संवाद, कानून के शासन और संवैधानिक मूल्यों के माध्यम से ही कम किया जा सकता है।
सामाजिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि भारत के विकास में समय-समय पर आंतरिक और बाहरी चुनौतियां आती रही हैं। ऐसे में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव और विकासोन्मुख सोच ही देश को आगे ले जा सकती है। किसी भी विकास परियोजना या सरकारी नीति पर लोकतांत्रिक तरीके से चर्चा और समीक्षा होना आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रहित और सामाजिक सौहार्द को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि उन आदर्शों को याद करने का भी दिन है जिनके लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया। यदि देश का प्रत्येक नागरिक जातिवाद, वंशवाद और संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाए, तो भारत को विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने का लक्ष्य और अधिक सशक्त रूप से प्राप्त किया जा सकता है।
यह लेख सामाजिक एवं सार्वजनिक विमर्श पर आधारित विचार-विश्लेषण है। इसका उद्देश्य किसी जाति, धर्म, समुदाय, राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष का समर्थन अथवा विरोध करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास से जुड़े मुद्दों पर संवाद को प्रोत्साहित करना है।
