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| रीवा संभाग की बदलती राजनीति: क्या विचारधारा पर हावी हो गई सत्ता की राजनीति? |
रीवा - विंध्य क्षेत्र की धरती अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत के लिए सदैव जानी जाती रही है। कभी बघेल राजाओं की राजधानी रहा रीवा आज प्रदेश की राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस क्षेत्र की पहचान केवल राजशाही तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहाँ जनहित और जनाधार की राजनीति करने वाले अनेक नेताओं ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है।
पुरानी पीढ़ी आज भी पूर्व महाराजा मार्तंड सिंह को सम्मान के साथ याद करती है। वहीं लोकतांत्रिक राजनीति में जगदीश चंद्र जोशी, जमुना प्रसाद शास्त्री, अर्जुन सिंह और पंडित श्रीनिवास तिवारी जैसे दिग्गजों ने विंध्य को नई दिशा दी। इन नेताओं की राजनीति व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से अधिक जनसेवा और वैचारिक प्रतिबद्धता पर आधारित मानी जाती थी, जिनके अनेक शिष्य आज भी प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं।
1995 के बाद बदला राजनीतिक परिदृश्य राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 1995 के बाद रीवा और विंध्य की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। व्यक्तिवाद और सत्ता प्रबंधन का दौर शुरू हुआ, जहाँ वैचारिक राजनीति की जगह चुनावी समीकरणों ने ले ली। इस दौरान कई क्षेत्रीय नेताओं की विरासत धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई।
त्योंथर के दिवंगत पूर्व विधायक रमाकांत तिवारी के वारिसों, कद्दावर नेता चंद्रमा त्रिपाठी, वरिष्ठ अधिवक्ता भाजपा नेता कौशल मिश्रा, केशव पांडे, शिवनाथ पटेल और सुशील मिश्रा जैसे समर्पित नेताओं व उनके परिवारों को कथित तौर पर राजनीतिक षड्यंत्रों के चलते हाशिए पर धकेल दिया गया। जिन्होंने वर्षों संगठन को सींचा, उन्हें ही अप्रासंगिक बनाने के प्रयास हुए।
दलबदल और भाजपा के भीतर बढ़ता असंतोष चुनावों के दौरान नेताओं का एक दल से दूसरे दल में जाना और टिकट पाना अब आम बात हो चुकी है, जिसने विचारधारा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं में उपेक्षा को लेकर भारी असंतोष है। संगठन की मूल विचारधारा अब केवल 'सत्ता केंद्रित' होती दिख रही है।
क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कौन से ऐसे तत्व हैं जो सत्ता के सुख के लिए अपनों से ही छल कर भाजपा को 'महाभारत' की स्थिति की ओर धकेल रहे हैं।
जनता की अपेक्षाएं और लोकतंत्र का संदेश यद्यपि राम मंदिर, सनातन संस्कृति और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर जनता ने वर्तमान सत्ताधारी दल को पूर्ण समर्थन दिया है, लेकिन नागरिक केवल भावनात्मक मुद्दों तक सीमित नहीं रहना चाहते। जनता विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुशासन की भी ठोस अपेक्षा रखती है।
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि सत्ता कभी स्थायी नहीं होती और लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के ही हाथ में है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल अपनी वैचारिक मर्यादा और जनसेवा के मूल सिद्धांतों को कितना बचा पाते हैं।
