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| रीवा-मऊगंज में भूमाफियाओं का बढ़ता प्रभाव: लोकतंत्र की आड़ में जमीन का खेल, आखिर कब जागेगा प्रशासन? |
रीवा - स्वतंत्र भारत की परिकल्पना एक ऐसे लोकतंत्र की थी, जिसमें जनता की सरकार जनता के हितों की रक्षा करेगी और कानून सभी के लिए समान होगा। किंतु समय के साथ लोकतंत्र के इस आदर्श स्वरूप पर सत्ता, प्रभाव और आर्थिक हितों का साया गहराता गया। रीवा और नवीन मऊगंज जिले का वर्तमान परिदृश्य भी कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है, विशेषकर भूमि प्रबंधन, अतिक्रमण और कथित भूमाफियाओं के बढ़ते प्रभाव को लेकर।
क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछले चार दशकों में रीवा संभाग में भूमि का व्यवसाय अत्यंत लाभकारी और प्रभावशाली माध्यम बनकर उभरा है। आरोप यह भी लगाए जाते रहे हैं कि समय-समय पर प्रभावशाली लोगों, उनके परिजनों, रिश्तेदारों अथवा सहयोगियों के नाम पर बड़ी मात्रा में भूमि का क्रय-विक्रय और हस्तांतरण हुआ है। हालांकि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच और आधिकारिक पुष्टि प्रशासनिक स्तर पर होना आवश्यक है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भूमि विवादों से जुड़े मामलों में अक्सर यह शिकायत सामने आती है कि सामान्य नागरिक को न्याय पाने के लिए वर्षों तक राजस्व न्यायालयों और सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जबकि प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई अपेक्षाकृत शीघ्र होती दिखाई देती है। यदि यह धारणा समाज में मजबूत हो रही है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
सत्ता बदली, व्यवस्था नहीं
लोकतंत्र में जनता समय-समय पर सत्ता परिवर्तन करती है, यह अपेक्षा करते हुए कि नई सरकार जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देगी। लेकिन जनता के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, भूमि से जुड़े विवादों और अतिक्रमण के मामलों में व्यवस्था में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं दिखाई देता? राजनीतिक दल बदलते हैं, लेकिन आरोपों के स्वरूप और शिकायतों का सिलसिला यथावत बना रहता है।
ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचा भूमि कारोबार
पहले भूमि विवाद और अतिक्रमण के मामले बड़े शहरों, नगर निगमों और नगरपालिकाओं तक सीमित माने जाते थे, लेकिन अब इनकी पहुंच ग्रामीण अंचलों तक हो गई है। गांवों में रास्तों का निर्धारण, सरकारी भूमि का सीमांकन, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और निजी भूमि से जुड़े मामलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर भी अनेक शिकायतें सामने आती रहती हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार प्रभावशाली व्यक्तियों के हितों के अनुरूप रास्ते निकलवाने, सीमांकन कराने अथवा अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाइयों में तेजी दिखाई जाती है, जबकि सामान्य नागरिकों के आवेदन वर्षों तक लंबित पड़े रहते हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
सरकारी भूमि पर किसका कब्जा?
रीवा और मऊगंज जिले में आज भी अनेक शासकीय भूमि, तालाब, सार्वजनिक मार्ग, मंदिरों की भूमि, श्मशान और कब्रिस्तान जैसी सार्वजनिक संपत्तियों पर अतिक्रमण के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। सवाल यह है कि इन सार्वजनिक संपत्तियों को मुक्त कराने के लिए दीर्घकालिक और पारदर्शी नीति क्यों नहीं बनाई जा रही?
प्रशासन जारी करे श्वेत पत्र
जनहित में यह मांग उठ रही है कि जिला प्रशासन और राज्य सरकार एक विस्तृत श्वेत पत्र जारी करें, जिसमें निम्नलिखित जानकारी सार्वजनिक की जाए—
जिले में कुल कितनी शासकीय भूमि अतिक्रमण की चपेट में है?
पिछले दस वर्षों में कितनी भूमि अतिक्रमण मुक्त कराई गई?
कितने मामलों में प्रभावशाली व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई?
तालाब, सार्वजनिक मार्ग, मंदिर, श्मशान और कब्रिस्तान की कितनी भूमि विवादित या अतिक्रमित है?
अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक प्रक्रिया क्या है और उसकी समय-सीमा कितनी है?
जनता जानना चाहती है जवाब
प्रशासन द्वारा समय-समय पर एक-दो अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कर उपलब्धियां गिनाई जाती हैं, लेकिन क्या इससे समस्या का स्थायी समाधान संभव है? यदि हजारों एकड़ सरकारी भूमि आज भी अतिक्रमण की चपेट में है, तो केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकती।
लोकतंत्र की असली ताकत उसकी पारदर्शिता और समान न्याय व्यवस्था में निहित है। यदि कानून गरीब और प्रभावशाली व्यक्ति के लिए अलग-अलग दिखाई देने लगे, तो जनता का विश्वास व्यवस्था से कमजोर होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भूमि से जुड़े मामलों में पूर्ण पारदर्शिता, समयबद्ध कार्रवाई और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, ताकि लोकतंत्र का मूल उद्देश्य—जनहित और न्याय—वास्तविक अर्थों में स्थापित हो सके।
वर्त्तमान समय पर भूमि का कार्य काल सत्ता वर्चस्व पर बैठे हुये लोगो के सगे सम्बन्धी सम्पर्कियो के हर तरह के फायदा देने के लिए येन केन प्रकारणेंन भू-माफिया के अप्रत्यक्ष सपोर्ट पर दिख रहे है चाहे जो भी सरकारे रही हो भूमाफिया का वर्चास्वा रहा है खली चहरे बदलते रहते है
(यह लेख जनहित में उठाए जा रहे सामाजिक एवं प्रशासनिक प्रश्नों पर आधारित है। किसी भी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की पुष्टि संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा की जानी अपेक्षित है।)
