
रीवा संभाग: प्रशासनिक विसंगतियों और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की जमीनी हकीकत
रीवा/मऊगंज -रीवा संभाग में वर्तमान में शासन की कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक कामकाज का जो स्वरूप देखने को मिल रहा है, वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए गहरी चिंता और चिंतन का विषय है। जनसरोकार और विकास की बातें कागजों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित होकर रह गई हैं, जबकि धरातल पर आम जनजीवन अव्यवस्थाओं के बोझ तले दब रहा है।
व्यवस्था पर सवार भ्रष्टाचार: विभागों का कच्चा-चिट्ठा
परिवहन विभाग और बेलगाम परिवहन: विभाग के भीतर व्याप्त कथित भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो गई हैं कि कर्मचारियों और अधिकारियों की आय में आए दिन हो रही अनैतिक वृद्धि किसी से छिपी नहीं है। फिटनेस और प्रशिक्षण के नाम पर औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं, जिसका खामियाजा आए दिन सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं के रूप में आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। खनिज संपदा का दोहन: रीवा संभाग की भौगोलिक संरचना—पहाड़ और नदियाँ—वर्तमान में अत्यधिक खनन के कारण खोखली होती जा रही है। पत्थर, मुरम और रेत का अवैध उत्खनन शासन के राजस्व को पलीता लगा रहा है और प्राकृतिक संतुलन को नष्ट कर रहा है। यह केवल संसाधनों की लूट नहीं, बल्कि भविष्य के लिए पर्यावरणीय खतरा है। आबकारी और स्वास्थ्य का विरोधाभास: आबकारी विभाग भले ही सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा हो, लेकिन जिस गुणवत्ताहीन शराब की बिक्री धरातल पर हो रही है, वह गरीब परिवारों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। दूसरी ओर, औषधि निरीक्षक (Drug Inspector) की कार्यप्रणाली केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित है। बिना लाइसेंस और मानकों के संचालित मेडिकल स्टोरों की बाढ़ ने स्वास्थ्य व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। सहकारिता और अन्य विभाग: धान और गेहूं की खरीदी से लेकर सहकारिता की विभिन्न योजनाओं तक में जिस तरह की अनियमितताओं के आरोप सामने आ रहे हैं, वे प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। राजस्व, पुलिस, महिला-बाल विकास और लोक निर्माण जैसे विभाग अपनी जवाबदेही से किनारा करते दिख रहे हैं।
सूचना का अभाव और पत्रकारिता की चुनौती
लोकतंत्र में मीडिया शासन और जनता के बीच का सेतु है। एक मीडिया इन-चार्ज के रूप में यह स्पष्ट है कि पारदर्शी शासन का दावा करने वाली मशीनरी, वास्तविक आंकड़ों और सूचनाओं को साझा करने के बजाय केवल चुनिंदा प्रेस विज्ञप्तियों तक सिमट गई है। आज स्थिति यह है कि गंभीर अपराधों की जानकारी छुपाना और केवल नशा या मामूली चालानी कार्रवाई की विज्ञप्तियां जारी करना एक प्रवृत्ति बन गई है। आरटीआई (RTI) जैसे सशक्त माध्यम के बावजूद, सूचना प्राप्त करने में हो रही अनावश्यक देरी यह दर्शाती है कि प्रशासनिक पारदर्शिता केवल औपचारिक रह गई है। जब जनता को सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं होगी, तो जन-चर्चाएं और अफवाहें ही सच का आधार बन जाएंगी।
एक जिम्मेदार पत्रकारिता के नाते हम केवल यह चाहते हैं कि शासन की नीतियां और प्रशासनिक क्रियाकलाप जनता तक सही रूप में पहुंचें। रीवा संभाग में व्यवस्था सुधार के लिए आवश्यक है कि भ्रष्ट तंत्र पर कड़ा प्रहार हो और सूचनाओं के आदान-प्रदान में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। अन्यथा, सरकार और जनता के बीच का यह संवादहीनता का गैप लोकतंत्र के लिए घातक साबित होगा।