रीवा संभाग में भ्रष्टाचार पर बड़ा सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन? लोकायुक्त की ताबड़तोड़ कार्रवाई के बाद भी क्यों नहीं तय होती वरिष्ठों की जवाबदेही?

रीवा संभाग में भ्रष्टाचार पर बड़ा सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन? लोकायुक्त की ताबड़तोड़ कार्रवाई के बाद भी क्यों नहीं तय होती वरिष्ठों की जवाबदेही?

रीवा: रीवा संभाग में पिछले कुछ वर्षों के दौरान लोकायुक्त की कार्रवाई ने लगभग हर सरकारी विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के गहरे दलदल को उजागर किया है। राजस्व, स्वास्थ्य, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, सहकारिता, महिला एवं बाल विकास, कृषि, पशुपालन सहित शायद ही कोई ऐसा विभाग बचा हो, जिसके अधिकारी या कर्मचारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों न पकड़े गए हों। ऐसे में अब विंध्य की जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर इस व्यवस्था में संस्थागत रूप से व्याप्त भ्रष्टाचार की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी कौन लेगा? लोकायुक्त की कार्रवाई के दौरान अक्सर किसी बाबू, पटवारी, पंचायत सचिव, इंजीनियर या निचले स्तर के विभागीय कर्मचारी को ट्रैप किया जाता है। लेकिन यह यक्ष प्रश्न लगातार प्रशासनिक गलियारों और आम जनता के बीच गूंज रहा है कि क्या भ्रष्टाचार केवल एक व्यक्ति तक ही सीमित होता है? क्या बिना किसी ऊंचे संरक्षण, शह और प्रशासनिक शिथिलता के विभागों में वर्षों तक भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो सकती हैं?

व्यक्तिगत विफलता नहीं, यह तो संस्थागत नाकामी है!

मामले के विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का साफ मानना है कि भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने वाले किसी एक व्यक्ति का व्यक्तिगत अपराध नहीं है। बल्कि यह एक ऐसी लचर व्यवस्था का परिणाम है, जिसमें जवाबदेही की भारी कमी और विभागीय निगरानी तंत्र की घोर कमजोरी शामिल होती है। यदि किसी विभाग में लगातार एक के बाद एक लोकायुक्त की कार्रवाइयां हो रही हैं, तो इसे केवल व्यक्तिगत विफलता मानकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता, बल्कि यह साफ तौर पर एक बड़ी संस्थागत विफलता का संकेत है।

संभाग के हर छोटे-बड़े विभाग पर उठ रहे गंभीर सवाल

रीवा संभाग के विभिन्न जिलों में समय-समय पर जिन प्रमुख विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ लोकायुक्त का डंडा चला है, उनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • राजस्व विभाग (जमीन संबंधी नामांतरण और सीमांकन के नाम पर)

  • स्वास्थ्य विभाग (अस्पतालों की व्यवस्था और बिल पास कराने के नाम पर)

  • सहकारिता विभाग एवं समितियां

  • पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग (विकास कार्यों के मूल्यांकन और भुगतान के नाम पर)

  • महिला एवं बाल विकास विभाग

  • कृषि एवं पशुपालन विभाग

  • शिक्षा विभाग सहित अन्य महत्वपूर्ण महकमे।

इन लगातार सामने आ रहे मामलों ने आम जनता के बीच इस धारणा को पत्थर की लकीर बना दिया है कि भ्रष्टाचार अब छिटपुट नहीं, बल्कि एक संगठित समस्या (Organized Crime) बन चुका है। लोगों का स्पष्ट कहना है कि यदि किसी विभाग में बार-बार रिश्वतखोरी के मामले उजागर होते हैं, तो केवल निचले स्तर के मोहरों को दोषी ठहराकर शीर्ष अधिकारियों और पूरी व्यवस्था को दोषमुक्त नहीं माना जा सकता।

क्या वरिष्ठ अधिकारियों की भी कभी तय होगी जवाबदेही?

आम जनता के बीच आज सबसे अधिक चर्चा और आक्रोश इस बात को लेकर है कि जब किसी विभाग में लोकायुक्त की बड़ी रेड होती है, तो उस विभाग के जिला प्रमुख या वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और लचर मॉनिटरिंग की समीक्षा क्यों नहीं की जाती? क्या विभागाध्यक्षों और उच्च अधिकारियों से शासन स्तर पर यह पूछा जाना चाहिए कि उनके ठीक नाक के नीचे उनके अधीनस्थ कर्मचारी महीनों और सालों से भ्रष्टाचार का खेल कैसे खेल रहे थे? कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ कड़ी प्रशासनिक जवाबदेही तय करना भी वक्त की सबसे बड़ी मांग है। यदि किसी कार्यालय में भ्रष्टाचार की शिकायतें लगातार मिल रही हैं, तो यह भी उच्च स्तरीय जांच का विषय होना चाहिए कि वहां की कार्यप्रणाली में क्या तकनीकी कमियां हैं और वरिष्ठों द्वारा उनकी निगरानी किस स्तर पर की जा रही थी।

भ्रष्टाचार: एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती

सामाजिक चिंतकों का मानना है कि भ्रष्टाचार अब केवल एक आर्थिक अपराध नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम नागरिक के मौलिक अधिकारों पर एक क्रूर हमला है। एक गरीब और आम व्यक्ति को अपना जायज प्रमाण पत्र बनवाने, भूमि संबंधी मामूली कार्य कराने, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने, स्वास्थ्य सुविधाएं पाने और अन्य मूलभूत प्रशासनिक सेवाएं प्राप्त करने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं और अनावश्यक मानसिक व आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। भ्रष्टाचार की इसी दीमक की वजह से शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पाता। यही कारण है कि आज समाज में इस कथित 'कट-मनी' संस्कृति को लेकर भारी नाराजगी और आक्रोश दिखाई दे रहा है।

जनता का तीखा सवाल— भ्रष्टाचार के खिलाफ कब चलेगा कोई बड़ा 'महा-अभियान'?

विंध्य की जागरूक जनता अब शासन-प्रशासन से सीधा सवाल पूछ रही है कि जिस प्रकार केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा नशे और अपराधियों के खिलाफ व्यापक स्तर पर बुलडोजर और 'नशामुक्ति 2.0' जैसे अभियान चलाकर लोगों का विश्वास जीतने का प्रयास किया जा रहा है, ठीक उसी प्रकार अब आम नागरिकों के हक पर डाका डालने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ भी एक व्यापक, निष्पक्ष और प्रभावी महा-अभियान क्यों नहीं चलाया जाता? जनता यह जानना चाहती है कि यदि किसी विभाग में रिश्वतखोरी उजागर होती है, तो उसकी प्रशासनिक और नैतिक जिम्मेदारी किस स्तर तक तय की जाएगी? क्या केवल आरोपी कर्मचारी की गिरफ्तारी ही पर्याप्त मान ली जाएगी या फिर भ्रष्टाचार की जड़ों तक पहुंचकर पूरे तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी?

निर्णायक सुधार और जवाबदेही तय होना समय की मांग

रीवा संभाग में लगातार सामने आ रहे इन शर्मनाक मामलों ने शासन-प्रशासन की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि लोकायुक्त की हर कार्रवाई स्वागतयोग्य है और भ्रष्टाचारियों में डर पैदा करती है, लेकिन यदि इन कार्रवाइयों के बाद भी व्यवस्थागत सुधार और शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होती, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ यह पूरी लड़ाई अधूरी और बेअसर ही मानी जाएगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि भ्रष्टाचार को केवल एक व्यक्ति का अपराध मानने के बजाय इसे एक बड़ी संस्थागत चुनौती के रूप में देखा जाए। दोषियों के साथ-साथ जवाबदेही की पूरी श्रृंखला (Chain of Accountability) की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए, तभी आम जनता का शासन और प्रशासनिक व्यवस्था पर खोया हुआ विश्वास फिर से बहाल और मजबूत हो सकेगा।

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