कुपोषण मिटाने की योजनाओं में अनियमितताओं के आरोप, रीवा-मऊगंज में समूह संचालन व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल

कुपोषण मिटाने की योजनाओं में अनियमितताओं के आरोप, रीवा-मऊगंज में समूह संचालन व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल

रीवा - देश में कुपोषण की समस्या को दूर करने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा करोड़ों रुपये की विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण पोषण आहार उपलब्ध कराना है। विश्व बैंक सहित विभिन्न संस्थाओं के सहयोग और सरकार द्वारा किए जाने वाले बजटीय प्रावधानों के माध्यम से राज्यों को पोषण संबंधी योजनाओं के लिए बड़ी राशि आवंटित की जाती है। मध्य प्रदेश में इन योजनाओं का संचालन मुख्य रूप से महिला एवं बाल विकास विभाग तथा कुछ पोषण संबंधी कार्यक्रमों में शिक्षा विभाग के माध्यम से किया जाता है, जिनमें स्वयं सहायता समूहों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाती है। रीवा और मऊगंज जिलों में समूहों के संचालन को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि कई स्थानों पर समूहों के गठन और संचालन में शासन की मंशा के अनुरूप पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। समूहों के चयन से लेकर पोषण सामग्री के वितरण तक राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव की चर्चाएं आम हो चुकी हैं।

जानकारों का कहना है कि निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर है, उन्हीं के प्रभाव वाले लोगों को समूहों के संचालन का लाभ मिलने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई समूह संचालकों को स्थानीय स्तर पर राजनेताओं, प्रभावशाली व्यक्तियों अथवा सत्ताधारी दल से जुड़ा बताया जाता है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, बल्कि कुपोषण जैसी गंभीर समस्या के समाधान के प्रयासों को भी प्रभावित कर सकता है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि कुछ स्थानों पर वर्षों तक पोषण आहार का निर्माण अथवा वितरण नहीं होने के बावजूद समूहों के नाम पर खाद्यान्न एवं शासकीय राशि का आवंटन होता रहा। गढ़ विकासखंड सहित अन्य क्षेत्रों में इस प्रकार की शिकायतें स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हालांकि इन मामलों की पुष्टि सक्षम जांच के बाद ही संभव है।

इसके अतिरिक्त, कई समूहों के संबंध में यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि समूह संचालकों के परिजन संबंधित आंगनबाड़ी केंद्रों में सहायिका अथवा कार्यकर्ता के पद पर कार्यरत हैं और वही समूह संबंधित केंद्रों को सामग्री की आपूर्ति भी कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो यह हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) की स्थिति उत्पन्न करता है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि गरीबी रेखा के मानकों के आधार पर समूहों का गठन किए जाने के बावजूद कुछ ऐसे लोग भी समूहों का संचालन कर रहे हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत है। कुछ मामलों में ऐसे व्यक्तियों के नाम सामने आने की चर्चा है, जो संपन्न होने के बावजूद पात्रता के दायरे में स्वयं को प्रदर्शित कर समूहों का लाभ ले रहे हैं। यदि इन आरोपों में तथ्य हैं, तो यह पात्र हितग्राहियों के अधिकारों का सीधा हनन माना जाएगा।

मऊगंज जिले के देवतालाब क्षेत्र सहित कई स्थानों को लेकर यह चर्चा भी है कि यदि कोई अधिकारी वास्तविक स्थिति की निष्पक्ष जांच करने का प्रयास करता है तो उस पर राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव बनने लगता है। कुछ लोगों का कहना है कि ईमानदार अधिकारी भी कई बार कार्रवाई करने से इसलिए बचते हैं क्योंकि स्थानांतरण और राजनीतिक हस्तक्षेप का भय बना रहता है। रीवा और मऊगंज जिलों के कलेक्टरों से जनता को काफी अपेक्षाएं थीं। प्रशासनिक सख्ती और पारदर्शिता को लेकर लोगों में प्रारंभिक उत्साह दिखाई दिया था, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर यह चर्चा शुरू हो गई है कि कार्रवाई की गति पहले की तुलना में धीमी पड़ती नजर आ रही है। इसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं, यह प्रशासन ही स्पष्ट कर सकता है।

एक बड़ा प्रश्न यह भी उठ रहा है कि जब किसी अधिकारी की पदस्थापना में जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा और राजनीतिक प्रभाव की भूमिका होती है, तब वह अधिकारी राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में कितनी स्वतंत्रता के साथ कार्रवाई कर सकता है? लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रशासनिक निष्पक्षता और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है। कुपोषण दूर करने के लिए बनाई गई योजनाएं समाज के सबसे कमजोर वर्गों—बच्चों और माताओं—के लिए हैं। ऐसे में यदि समूहों के गठन, पोषण सामग्री के वितरण और पात्रता को लेकर उठ रहे आरोपों की निष्पक्ष एवं व्यापक जांच नहीं होती, तो सरकारी धन के दुरुपयोग के साथ-साथ उन बच्चों का भी नुकसान होगा, जिनके लिए ये योजनाएं बनाई गई हैं।

अब आवश्यकता इस बात की है कि रीवा और मऊगंज जिलों में संचालित सभी समूहों का सामाजिक एवं वित्तीय ऑडिट कराया जाए। समूह संचालकों की पात्रता, उनके पारिवारिक संबंध, पोषण आहार के वास्तविक निर्माण एवं वितरण तथा शासकीय राशि के उपयोग की स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सरकार की मंशा के अनुरूप कुपोषण के विरुद्ध चलाया जा रहा अभियान वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है या नहीं।(नोट: समाचार में उल्लेखित आरोप स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों और जनचर्चाओं पर आधारित हैं। किसी भी अनियमितता की पुष्टि सक्षम प्रशासनिक एवं विधिक जांच के बाद ही की जा सकती है।

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