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| बच्चों के पोषण पर डाका? रीवा-मऊगंज में महिला एवं बाल विकास और शिक्षा विभाग की योजनाओं में करोड़ों के खेल की आशंका |
रीवा - रीवा संभाग के रीवा एवं नवगठित मऊगंज जिले में संचालित महिला एवं बाल विकास विभाग तथा शिक्षा विभाग की पोषण संबंधी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह आरोप सामने आ रहे हैं कि आंगनबाड़ी केंद्रों एवं शासकीय विद्यालयों में बच्चों को दिए जाने वाले पोषण आहार, पका हुआ भोजन तथा अन्य खाद्य सामग्री के वितरण में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हो रही हैं, जिनकी निष्पक्ष और व्यापक जांच की आवश्यकता है।
जानकारी के अनुसार, दोनों जिलों के कई प्रशासनिक कार्यों का संचालन अभी भी एक ही तंत्र के माध्यम से होने के कारण निगरानी व्यवस्था प्रभावी नहीं हो पा रही है। आरोप है कि 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों की आंगनबाड़ी केंद्रों में उपस्थिति और पोषण आहार वितरण के रिकॉर्ड तथा 6 से 13 वर्ष तक के बच्चों को विद्यालयों में दिए जाने वाले भोजन के अभिलेखों और वास्तविक स्थिति में भारी अंतर हो सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर बच्चों की वास्तविक संख्या की तुलना में अभिलेखों में अधिक संख्या दर्शाकर खाद्यान्न एवं राशि का आवंटन लिया जाता है। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है तो यह बच्चों के पोषण अधिकारों पर सीधा आघात माना जाएगा।
समूह संचालकों की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे सवाल
ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित स्व-सहायता समूहों एवं भोजन व्यवस्था से जुड़े समूह संचालकों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि कुछ समूहों में वर्षों से एक ही व्यक्ति अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष अथवा अन्य प्रमुख पदों पर बना हुआ है। वहीं, भोजन निर्माण के लिए नियुक्त रसोइयों के स्थान पर उनके परिजनों द्वारा कार्य किए जाने और मानदेय प्राप्त करने जैसी शिकायतें भी सामने आ रही हैं। आरोप यह भी हैं कि कई समूहों का संचालन प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों से जुड़े लोगों द्वारा किया जा रहा है, जिससे उनके विरुद्ध शिकायत होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो पाती। हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी समूह संचालकों पर ऐसे आरोप नहीं हैं और कई समूह ईमानदारीपूर्वक शासन की योजनाओं का संचालन कर रहे हैं।
आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषण मीनू के पालन पर प्रश्न
महिला एवं बाल विकास विभाग के अंतर्गत संचालित योजनाओं में गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं, किशोरी बालिकाओं एवं बच्चों को निर्धारित पोषण सामग्री उपलब्ध कराने का प्रावधान है। वहीं विद्यालयों में निर्धारित पोषण मीनू के अनुसार भोजन उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य है। स्थानीय स्तर पर यह शिकायतें प्राप्त हुई हैं कि कई केंद्रों एवं विद्यालयों में निर्धारित मीनू के अनुरूप भोजन नहीं दिया जा रहा। बच्चों को केवल दाल-चावल अथवा रोटी उपलब्ध कराए जाने की बात कही जा रही है, जबकि हरी सब्जियों एवं अन्य पोषक तत्वों की कमी देखी जा रही है। कई स्थानों पर मीनू बोर्ड केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं।
जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी उठे सवाल
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि विभिन्न स्तरों पर निरीक्षण एवं जांच की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की नियमित मॉनिटरिंग के बावजूद अनियमितताएं समाप्त नहीं हो रही हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि यदि योजनाओं का संचालन निर्धारित मानकों के अनुरूप हो रहा है, तो फिर लगातार शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? ग्रामीण क्षेत्रों में यह भी चर्चा है कि कुछ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा अपने स्थान पर अन्य व्यक्तियों से कार्य कराया जा रहा है, जबकि वे स्वयं मुख्यालय अथवा अन्य स्थानों पर निवास कर रही हैं। यदि ऐसा पाया जाता है तो यह सेवा नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।
करोड़ों रुपये की योजनाओं की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता
महिला एवं बाल विकास विभाग तथा शिक्षा विभाग के माध्यम से संचालित पोषण योजनाओं पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये व्यय किए जाते हैं। ऐसे में यदि कहीं भी अनियमितताएं हो रही हैं तो उनकी जिम्मेदारी तय होना अत्यंत आवश्यक है। जनप्रतिनिधियों एवं स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि रीवा एवं मऊगंज जिले के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों, स्व-सहायता समूहों तथा विद्यालयों में संचालित भोजन एवं पोषण योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) कराया जाए। इसके साथ ही बच्चों की वास्तविक उपस्थिति, खाद्यान्न की खपत, बैंक खातों के लेन-देन, समूहों के गठन एवं भुगतान संबंधी अभिलेखों की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए।
प्रशासन से उठी यह मांग
दोनों जिलों के सभी आंगनबाड़ी एवं विद्यालयों का औचक निरीक्षण कराया जाए।
पोषण आहार एवं खाद्यान्न वितरण का भौतिक सत्यापन किया जाए।
स्व-सहायता समूहों के गठन और संचालन की जांच हो।
वर्षों से एक ही पद पर बने व्यक्तियों के मामलों की समीक्षा की जाए।
बच्चों की वास्तविक संख्या और पोषण सामग्री के वितरण का मिलान कराया जाए।
दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं समूह संचालकों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
बच्चों के पोषण और उनके भविष्य से जुड़ी योजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना शासन और प्रशासन दोनों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं होगा, बल्कि समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग—नौनिहालों—के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय होगा। निष्पक्ष जांच ही इस पूरे मामले की सच्चाई सामने ला सकती है।
