![]() |
| रीवा-मऊगंज की पुलिस व्यवस्था पर उठे सवाल: थानों में बंद गेट और सोते पुलिसकर्मी जितने चिंताजनक, उतनी ही गंभीर है बल की कमी |
रीवा - पुलिस आम नागरिकों की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। समाज का हर व्यक्ति इस विश्वास के साथ रात में सोता है कि किसी भी आपात स्थिति में पुलिस उसकी सहायता के लिए तत्पर रहेगी। लेकिन यदि आधी रात को कोई पीड़ित थाने पहुंचे और उसे मुख्य द्वार बंद मिले या ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी विश्राम करते दिखाई दें, तो पुलिस व्यवस्था पर प्रश्न उठना लाजमी है। हाल ही में 'दैनिक भास्कर' की विशेष रात्रिकालीन पड़ताल में रीवा और मऊगंज जिले के कई थानों व चौकियों से सामने आई तस्वीरों ने रात्रिकालीन कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इस सिक्के का दूसरा पहलू पुलिस बल की भारी कमी और अत्यधिक कार्यभार भी है।
रात्रिकालीन पड़ताल में सामने आए प्रमुख तथ्य
निरीक्षण के दौरान कई थानों की स्थिति चिंताजनक पाई गई:
कोतवाली थाना: मुख्य गेट अंदर से हथकड़ी लगाकर बंद किया गया था। काफी देर दस्तक देने के बाद गेट खुला और एफआईआर कक्ष में मुंशी विश्राम करते पाए गए।
चोरहटा थाना: यहां भी मुख्य गेट बंद मिला, जिस पर पुलिसकर्मियों ने सुरक्षा कारणों का हवाला दिया।
बिछिया थाना: ड्यूटी के दौरान मुंशी विश्राम करते हुए मिले।
नया बस स्टैंड पुलिस चौकी: मुख्य द्वार बंद था और मौके पर कोई पुलिसकर्मी उपस्थित नहीं था।
इन घटनाओं ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि रात में किसी महिला, बुजुर्ग या दुर्घटना पीड़ित को तत्काल सहायता की आवश्यकता हो, तो उसे मदद कैसे मिलेगी?
कमी और कार्यभार: व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी
रीवा और नवीन जिला मऊगंज में शहरी और ग्रामीण इलाकों के थानों में लंबे समय से पुलिस बल की भारी कमी बनी हुई है। थानों में कोर्ट संबंधी कार्य, मददगार शाखा, आपातकालीन सेवाएं (डायल-112) और प्रशासनिक दायित्वों का इतना दबाव है कि गेट पर नियमित संतरी ड्यूटी लगाने तक के लिए पर्याप्त जवान उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसे में जनता की मांग है कि राज्य सरकार व पुलिस मुख्यालय सार्वजनिक करे कि दोनों जिलों के थानों में कुल कितने पद स्वीकृत हैं, कितने रिक्त हैं और निर्धारित जनसंख्या के अनुपात में कितने पुलिसकर्मी तैनात हैं।
पुलिसकर्मियों के मानवाधिकार और अत्यधिक कार्यभार
समीक्षा के दौरान केवल कमियों को उजागर करना पर्याप्त नहीं है; पुलिसकर्मी भी समाज का हिस्सा हैं और उनके मानवाधिकारों पर भी चर्चा होनी चाहिए। सामान्य श्रम नियमों के तहत कार्य के घंटे तय होते हैं, लेकिन पुलिसकर्मी अक्सर 12 से 18 घंटे लगातार ड्यूटी करते हैं। त्योहारों, चुनावों, वीआईपी ड्यूटी और कानून-व्यवस्था के समय यह अवधि और बढ़ जाती है। अत्यधिक मानसिक व शारीरिक दबाव का सीधा असर उनकी कार्यक्षमता पर पड़ता है।
सुधार और निष्पक्ष समीक्षा की मांग
यह मामला केवल व्यक्तिगत लापरवाही तक सीमित नहीं है। जहां अनुशासनहीनता है वहां कार्रवाई हो, लेकिन साथ ही पुलिस बल की वास्तविक स्थिति और संसाधनों की निष्पक्ष समीक्षा भी आवश्यक है। जनहित में राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय से मांग की गई है कि:
स्वीकृत व रिक्त पदों की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
जनसंख्या के अनुपात में पुलिस बल की उपलब्धता सुनिश्चित हो।
पुलिसकर्मियों के दैनिक कार्य घंटों का वास्तविक आंकड़ा और रात्रिकालीन निगरानी प्रणाली बेहतर हो।
रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती की कार्ययोजना बनाई जाए।
पुलिस व्यवस्था की मजबूती केवल कठोर कार्रवाई से नहीं, बल्कि पर्याप्त मानव संसाधन, बेहतर कार्य परिस्थितियों और जवाबदेही के संतुलित समन्वय से ही संभव है। जनता और पुलिस दोनों की सुरक्षा व सम्मान सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आवश्यकता है।
